अत्यंत जटिल रोग मस्कुलर डिस्ट्रॉफी

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने आज इतनी प्रगति की है, नए-नए आविष्कार हुए हैं, नित नवीन औषधियों की खोज हो रही है फिर भी कुछ रोग ऐसे हैं, जिनका कोई इलाज आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियों के पास नहीं है। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Muscular Dystrophy) मांसपेशियों का एक ऐसाही विकार है, जो रोगीको धीरे-धीरे मृत्यु के करीब ले जाता है। इसे मांसपेशी का अपविकासया आयुर्वेदानुसार मांसक्षय कहते हैं।

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी रोग वंशानुगत दोष (जिनेटिक विकार) के कारण होता है। इस रोग में जीन्स की विकृति के कारण स्वस्थ मांसपेशी में बनने वाला प्रोटीन नहीं बनता है। इसके कारण अनेक प्रकार के कंकालीय मांसपेशी समूह (Proximal Groups Of Muscles) का संकुचन (Atrophy) या पेशी शोथ हो जाता है। यह प्रायः बचपन में होता है तथा सर्वप्रथम मांसपेशी की तंतु सूज जाती है। इसके बाद अर्धपारदर्शक वस्तुएं जमा होने लगती हैं तथा जोड़ने वाली तंतु का विकास अधिक मात्रा में होकर वसायुक्त ऊतकों के बीच में जमा होने लगता है क्योंकि उनकी कार्बोहाइड्रेट से ग्लाइकोजन बनाने की क्षमता समाप्त हो जाती है जिससे
कार्बाहाइड्रेट वसायुक्त ऊतक में बदलकर जमा होने लगता है और वसायुक्त ऊतक जमा होने से मांसपेशी अधिक सूजी या फूली हुई दिखाई पड़ने लगती है। इस प्रकार मांसपेशियों के क्षय होने की प्रक्रिया प्रारंभ होने लगती है। इसमें मांसपेशियों में अचानक कमजोरी या निर्बलता आती है। सबसे पहले मांसपेशियां अकड़ने लगती हैं, बाद में धीरे-धीरे स्थिर होकर पत्थर की तरह कड़क हो जाती हैं। इस अकड़न के कारण रोगी खड़ा होने, चलने-फिरने व अंत में बैठने में भी असमर्थ हो जाता है क्योंकि मांसपेशियों की सक्रियता समाप्त हो जाती है।

प्रमुख कारण :- मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के रोगी विश्व के हर क्षेत्र में पाए जाते हैं। कुछ विशेष प्रकार की डिस्ट्रॉफी बड़ों में पाई जाती है। इस प्रकार की डिस्ट्रॉफी के लक्षण में उम्र बढ़ने के साथ-साथ पेशियों में शनैः शनैः संकुचन एवं शिथिलता बढ़ जाती है। मांसपेशियों पर तेज आघात करने से उनमें तीव्र विक्षोभ उत्पन्न होता है। जीवन तथा आयु पर कोई प्रभाव नहीं होता है। तेज चलने पर संतुलन बिगड़ जाता है। यह रोग प्रोटीन डिस्ट्रॉफीन की कमी के कारण होता है। अध्ययन में पाया गया है कि सारकोलेमल मेम्ब्रेन (Sarcolemmal Membrane) की विकृति के फलस्वरूप यह रोग होता है। इस मेम्ब्रेन के द्वारा कैल्शियम मांसपेशियों के तंतुओं में सहजता से प्रवेश करता है और न्यूट्रल प्रोटिएस को गति देता है, जिससे मांसपेशी का कैटाबालिज्म अधिक होकर फाइबर नेक्रोस (मृत) हो जाता है। कि इस बीमारी का कारण एक्स गुणसूत्र ( क्रोमोसोम्स) में उपस्थित होता है। मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में 23 जोड़े क्रोमोसोम्स (गुणसूत्र) होते हैं। इनमें 22 जोड़े क्रोमोसोम्स पुरुष तथा स्त्री में एक समान होते हैं, परंतु 23वां जोड़ा लिंग गुणसूत्रों (Sex Chromosomes) का होता है। पुरुष में 23 जोड़ों में एक गुणसूत्र ‘एक्स’ और एक ‘वाई होता है, जबकि स्त्री में दोनों ही गुणसूत्र ‘एक्स’ होते है।

विभिन्न प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी रोग कुछ अपवादों को छोड़कर प्रायः लड़कों में होता है। परंतु डी.एम.डी. (ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी) जीन उसे मां की तरफ से ही प्राप्त होता है। डी.एम.डी. जीन स्त्री लिंग एक्स क्रोमोसोम में ही पाया जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बीमारी का कारण तेईसवें गुणसूत्र में मौजूद है। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से ग्रस्त कुछ बालकबाल्यावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो कुछ वयस्कावस्था तक कम ज्यादा तकलीफ में जीते हैं। यह
वयस्कों को भी हो सकता है, पर बच्चों को उग्र स्वरूप में होताहै।

निम्नलिखित 9 प्रकार के डिस्ट्रॉफी रोग खतरनाक किस्म के होते हैं। परंतु इनमें ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी अत्यंत जटिल होता है।

1. ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Duchenne Muscular Dystrophy)
यह बच्चों में आम तौर पर पाया जाने वाला मांसपेशी क्षय का विकार है। प्रायः इसका प्रभाव लड़कों पर ही होता है। कभी-कभी लड़कियां भी इस रोग के शिकंजे में फंस जाती हैं, किन्तु ऐसा बहुत ही कम होता है। विश्व में 6 पुरुषों व एक स्त्री को (6:1) के अनुपात में यह रोग होता है। यह लाइलाज आनुवंशिक रोग है। जीन की विकृति के कारण यह रोग होता है। इस जीन का कार्य डिस्ट्रॉफीन प्रोटीन का निर्माण करना है। यह प्रोटीन मांसपेशी के सेल्स को आकार व पावर देता है। इसकी अनुपस्थिति में मांसपेशियां टूटती जाती हैं व रोगी चलने में कमजोरी महसूस करता है।

ड्यूशन डिस्ट्रॉफी की खोज 1861 में ड्यूशन नामक वैज्ञानिक ने की थी। उन्होंने इस रोग से ग्रस्त रोगी के मृत शरीर का अध्ययन कर पाया कि इस रोग में मांसपेशियां ही क्षतिग्रस्त होती हैं। तंत्रिका तंत्र भी कुछ सीमा तक ही प्रभावित होता है। इस धारणा की एक अन्य वैज्ञानिक येरियान ने भी अपने प्रयोगों से पुष्टि की है। उन्होंने शोध के दौरान पाया कि रीढ़ की हड्डियां तथा न्यूरान पूर्णतया स्वस्थ थे, किंतु समस्त मांसपेशियां अज्ञात जैव रासायनिक कारणों से क्षतिग्रस्त थीं।

शैशव अवस्था में यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है। इस रोग से ग्रस्त बच्चे 4 साल तक स्वस्थ बच्चों की तरह होते हैं। 10 साल की उम्र में चलने के लिए रोगी को ब्रेसेस (Braces) की जरूरत होती है। 12 साल की उम्र तक व्हीलचेयर की सहायता से चलता है और 25 साल की उम्र तक रोगी की मृत्यु हो जाती है। परंतु प्रत्येक रोगी में अलग-अलग स्थिति होती है। बाद में धीरे-धीरे शरीर के विभिन्न अंगों की मांसपेशियां नष्ट तथा कमजोर होने लगती हैं। सर्वप्रथम नितंब तथा कमर (Pelvic Girdle) की मांसपेशियां कमजोर, क्षीण तथा निष्क्रिय होती हैं। उसके बाद पिंडलियों (Calt) की मांसपेशियां पुनः क्रमशः कंधे तथा बाहुमूल एवं भुजाओं (Shoulder Girdle) की मांसपेशियां सख्त और कठोर होकर अकड़ जाती हैं। उनकी निष्क्रियता बढ़ने से उठने-बैठने एवं चलने में कठिनाई होने लगती है। कुछ ही दिनों में फेफड़े तथा दिल की मांसपेशियां शिथिल एवं निष्क्रिय होने लगती हैं। 4-5 साल के भीतर रोगी अपंग, असहाय तथा पूर्णतया दूसरों पर आश्रित हो जाता है। ड्यूशन से पीड़ित कई रुग्णों को 2 वर्ष तक व्हीलचेयर की जरूरत पड़ती है। कई रुग्णों में बांहों,पैर व रीढ़ में विकृति आती है। श्वास कष्ट व हृदय विकृति रोग के अंतिम चरण में होती है। इस रोग से पीड़ित रुग्ण को हृदय रोग तज्ञ के निरीक्षण में रहना चाहिए। समय बीतने पर श्वासोच्छवास की मांसपेशियां भी कमजोर हो जाती हैं, जिससे अंतिम समय में वेंटीलेटर की जरूरत पड़ सकती है। इस रोग से ग्रस्त रुग्ण की मृत्यु 20-25 वर्ष की आयु तक श्वसन व हृदय विकार के कारण होती है।

2. मायोटोनिक मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Myotonic Muscular Dystrophy) : सामान्य रूप से पाया जाने वाला यह प्रकार वयस्कों में होता है। स्त्री-पुरुष दोनों इससे प्रभावित होते हैं। बाल्यावस्था से वयस्कावस्था तक यह कभी भी हो सकता है। बहुत कम ही नवजात शिशुओं (Congenital MMS) में हो सकता है। इसमें मांसपेशी में लंबे समय तक संकुचन व जकड़ाहट होती है। ठंडे प्रदेशों में रोगी की स्थिति अत्यंत दुष्कर होती है। इसमें मांसपेशियों की कमजोरी होती है व सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम (मस्तिष्क), हृदय, पाचनसंस्थान,आंखें व अंतःस्रावी ग्रंथियां भी प्रभावित होती हैं। अधिकांश रुग्णों में दिनचर्या कई वर्षों तक प्रभावित नहीं होती है। इसके कारण जीवन कम होता है।

3. बेकर्स मस्कुलर डिस्ट्राफी (Becker’s Muscular Dystrophy) यह प्रकार ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के समान है, परंतु ड्यूशन प्रकार की अपेक्षा कम कष्टदायी हैं। इसमें लक्षण काफी देर से प्रकट होते हैं व रोग धीरे-धीरे वृद्धिगत होता है। यह 2 वर्ष से 16 वर्ष के बीच होता है, परंतु 25 वर्ष तक इसके लक्षण दिखाई देते हैं। यह केवल पुरुष वर्ग में (3000 में 1) पाया जाने वाला विकार होता है जिसके कारण हृदय रोग भी होता है। इस व्याधि से ग्रस्त व्यक्ति 30 वर्ष तक अथवा इसके आगे भी जीवन जी सकता है।

4. लिम्ब गर्डल मस्कुलर डिस्ट्राफी (Limb Girdle Muscular Dystrophy): यह पुरुषों व स्त्रियों में होने वाला विकार है, जिसमें धीरे-धीरे मांसपेशियों का क्षय प्रारंभ होता है। शुरुआत में नितम्ब (Hips) की मांसपशियां कमजोर होती हैं और धीरे-धीरे कंधे, बांहों व पैरों की भी मांसपेशियों पर प्रभाव पड़ता है। इसमें चेहरे की मांसपेशियां प्रभावित नहीं होतीं। 20 साल में रोगी का चलना कठिन व असंभव हो जाता है।

5. फेशियोस्केपूलो हमरल मस्कूलर डिस्ट्राफी (Fascio Scapulo Humeral Muscular Dystrophy) : इस विकार में चेहरे (Face),कंधों (Scapula) व बांहों (Humerus) की मांसपेशियों पर प्रभाव पड़ता है। यह प्रकार किशोरावस्था में शुरू होकर प्रारंभिक वयस्कावस्था में मिलता है। यह धीरे-धीरे बढ़ता है। इसके कारण पैदल चलने, चबाने, निगलने व बोलने में कष्ट हो सकता है। 50% रुग्णों को जीवनभर इसकी तकलीफ होती है, पर अधिकांश रुग्ण सामान्य जीवन जी सकते हैं।

6. जन्मजात (Congenital Muscular Dystrophy): यह विकार जन्म से ही पाया जाता है। इसका प्रोग्रेस धीरे-धीरे होता है व स्त्री-पुरुष दोनों को हो जाता है। इसके 2 प्रकार पाए गए हैं। 1. फुकुयामा 2. मायोसीन की कमी से। इसके कारण मांसपेशियों की कमजोरी जन्म से या जन्म के प्रथम महीनों में होती है। इसमें मांसपेशियां छोटी होकर सिकुड़ जाती हैं, जिससे रुग्ण को तीव्र पीड़ा होती है। Fukuyama Congenital Muscular Dystrophy के कारण मस्तिष्क में विकृति होती है। जिससे रुग्ण को झटके (Seizures)आते हैं।

7. आक्यूलोफैरिनजीअल मस्कुलर डिस्ट्राफी (Oculopharyngeal Muscular Dystrophy): (Oculo) व गला (Pharynx) से संबधित मांसपेशियों के यह आंख क्षय का विकार है। यह रोग स्त्री-पुरुषों को 40 से 60 वर्ष की अवस्था में होता है तथा इसका विकास धीरे-धीरे होता है। आंखों व चेहरे की मांसपेशियों में कमजोरी आती है, जिससे निगलने में तकलीफ होती है। बाद में श्रोणि प्रदेश (Pelvis)व कंधों की मांसपेशियों में कृशता आती है। इससे बार-बार न्यूमोनिया होने की संभावना रहती है।

8. डिस्टल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Distal Muscular Dystrophy) : यह विकार स्त्री-पुरुषों दोनों में अल्प प्रमाण में (Rare) पाया जाता है। इससे शरीर के सेंटर लाइन की दूर की मांसपेशियां (Distal Muscles) प्रभावित होती हैं, जैसे- भुजाएं, हाथ, जंघा भाग व पैर । अन्य मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की अपेक्षा यह बहुत कम मांसपेशियों को प्रभावित करता है।

9. Emery Dreifuss Muscular Dystrophy : यह प्रकार भी बहुत कम दिखाई देता है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था के प्रारंभ तक केवल पुरुषों को होता है। इससे मांसपेशी की कमजोरी मुख्यतः कंधे, भुजाएं, जंघा भाग पर होती है। इससे घातक
हृदय विकार भी हो सकता है। यह रोगवाहक (Carriers) को भी प्रभावित करता है। वाहक अर्थात् वह व्यक्ति, जिसे रोग नहीं होता, लेकिन उस रोग के जीन्स उस व्यक्ति में उपलब्ध रहते हैं। इस प्रकार मांसपेशी छोटी हो जाती है। छाती व श्रोणि प्रदेश की मांसेपेशी में कृशता आती है। इसकी वृद्धि धीरे-धीरे होकर अन्य प्रकारों की अपेक्षा कम पीड़ा देने वाली होतीहै।

इस रोग का मायोसाइटिस (Myositis) रोग से सापेक्ष निदान (Differential Diagnosis) किया जाता है। जबकि मायोसाइटिस में मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है। पालथी मारकर बैठने के बाद उठने में अगर सहारे की जरूरत पड़ने लगे तो समझना चाहिए कि मासंपेशियां कमजोर होनी शुरू हो गई है। इसमें हाथों-पैरों की डिस्टेंट मसल्स (दूर की मसल्स जैसे पंजे, उंगलियां) की अपेक्षा जांघों, कूल्हों, कंधों,हाथों की प्रॉक्सीमल मसल्स यानी कि इन अंगों के नजदीक की मसल्स (जैसे कंधे और हाथ के जोड़ के पास की मसल्स, जांघो और पैर के जोड़ की मसल्स) ज्यादा प्रभावित होती है। गले की मांसपेशियों में दर्द
और कमजोरी के कारण खाना निगलने में भी दिक्कत होने लगती है। अगर चेस्ट बॉल मसल्स प्रभावित हुई हैं,तो तेज चलने पर सांसे फूलने लगती हैं। कुछ रोगियों में विशेष तरह के स्किन रैशेज दिखाई पड़ते हैं। यह अंगुलियों के पोरों पर घुटनों, एल्बोज पर हो सकते हैं। इसके अलावा पीठ में गर्दन के ठीक नीचे, सामने गले के एक दम नीचे भी रैडनेस हो जाती है।

निदान (Diagnosis)

इस बीमारी की पूर्ण पहचान प्रयोगशाला जांच (Laboratory Studies) पर निर्भर करती है, जैसे-

  1. Serum Enzymes
  2. Creatinine Phosphokinase (C.P.K) इस रोग में (C.P.K) बढ़ा हुआ रहता है।
  3. Serum Glutamic Oxaloacetic Transaminase (SGOT)
  4. Aldopuse
  5. Lactic dehy-drogenase (L.D.H)
  6. E.C.G.
  7. Muscle Biopsy – ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से ग्रस्त रुग्ण की मांसपेशी का क्रॉस सेक्शन लेने पर मांसपेशियों के तंतुओं के स्थान पर एडिपोज़ सेल (Adipose Cells) दिखाई देते हैं।
  8. Electromyography
  9. Electrocardiography
  10. DNAAnalysis
    उपरोक्त जांच से पूरी तरह पता चलता है कि मरीज मांसपेशी अपविकास अर्थात् मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से ग्रसित है या नहीं।

आयुर्वेद का मत

आयुर्वेद में दोष धातु-मल को शरीर का आधार कहा गया है। धातु अर्थात् जो शरीर को धारण करे। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा व शुक्र क्रमशः सप्त धातुएं हैं। प्रत्येक आगे की धहुत, पिछली धातु का चयापचय-जन्य उत्कृष्ट घटक है। आहार रस पर धातु पाक होकर रस धातु, रस से रक्त की निर्मिति, रक्त से मांसधातु इत्यादि इस प्रकार क्रमशः 7 धातुएं निर्मित होती हैं।

आयुर्वेद मे वात (प्राण) व रक्त धातु जीवन के प्रमुख स्रोत माने गए हैं। शरीर की भिन्न-भिन्न गतिविधियों के लिए वात दोष का महत्व है। इसी के कारण कोषाणुओं का पोषण होता है। रक्त धातु की गति का कारण वात दोष ही है। दोनों का एक-दूसरे से साहचर्य संबंध है। वात (प्राण) के कारण मांसपेशियां सिकुड़ती व फैलती हैं। इस प्रकार सभी धातुएं, धात्वग्नियां तथा वात दोष एक दूसरे पर आश्रित हैं।

आयुर्वेद में चयापचय (Metabolism) के लिए 13 प्रकार की अग्नि का वर्णन है। जठराग्नि की, धातुओं की 7 अग्नियां तथा पंचमहाभूत की 5 भूताग्नियां। धात्वाग्नि की क्षय-वृद्धि के कारण तत्-तत् धातु बढ़ती या कम होती है। चरक के अनुसार मांसक्षय का कारण मज्जागत कुपित वात है। अतः मांसक्षय की यह अवस्था वात क्षय के कारण होती है।

आयुर्वेदानुसार यह जिनेटिक विकार बीज दोष के अंतर्गत आता है, जिससे शरीर में स्थित प्राकृत वात विकृत होता है। स्रोतों की दुष्टि (Sarcolemmal Membrane Defect) के कारण मांस धातु का क्षय होता है।

चिकित्सा

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के लिए कोई विशेष चिकित्सा किसी भी पैथी में नहीं है। आल्टरनेटिव चिकित्सा के द्वारा इस रोग पर लाभ प्राप्त किया जा सकता है। चिकित्सा से लक्षण में कमी आती है व उपद्रव (काम्प्लिकेशन) से बचा जा सकता है। आधुनिक शास्त्र में स्पीच थेरेपी, आर्थोपेडिक डिवाइस, सर्जरी व औषधि इत्यादि चिकित्सा की जाती है। आयुर्वेद चिकित्सा में औषधि, आहार, योग व पंचकर्म के आशाजनक परिणाम पाए गए हैं।

  1. औषधि चिकित्सा : आयुर्वेदानुसार मांसक्षय की अवस्था में वातक्षय होने के कारण इसमें अग्निवर्धक, मांसवर्धक व वातशमन चिकित्सा सिद्धांत के आधार पर औषधि दी जाती है। अग्निवर्धक औषधि में त्रिकटु, चित्रकादि वटी दी जाती है। मांसवर्धक औषधियों में बल्य औषधियां जैसे-अश्वगंधा, बला शतावरी इत्यादि व जीवनीय-गण की औषधियां दी जाती हैं। इसमें आयुर्वेद की रसायन चिकित्सा भी लाभकारी पाई गई है। रसायन ऐसी औषधियां हैं, जिनसे धातुओं का पोषण होता है। यह आयुर्वेद की विशेष औषधियां हैं, जिनसे प्रत्येक धातु का रस (Enzyme) बढ़ता है। शुद्ध स्वर्ण भस्म की अल्प मात्रा मांस व मज्जा धातुक्षय में उपयोगी पाई गई है। रसायन के पूर्व पंचकर्म करना आवश्यक है। इस प्रकार आयुर्वेदिक चिकित्सा से मांसाग्नि (CPK Enzyme) को संतुलित कर आयु वृद्धि की जा सकती है।

पंचकर्म

  1. मांसधातु की वृद्धि एवं अतिरिक्त मेदधातु का नाश करने वाले उपायों में पंचकर्म की तिलमांस पिंड स्वेदन विधि सर्वश्रेष्ठ है। इसमें तिलमांष के अलावा षष्टिशाली प्रकार का बिना पालिश किया चावल एवं गेहूं का चोकर प्रयुक्त होता है। साथ ही जीवनीय-गण की औषधियों जैसे- बला एवं अश्वगंधा के काढ़े का प्रयोग होता है।
  2. मांसाग्नि के रिसाव का प्रधान कारण वात प्रकोप माना गया है। इसके शमन हेतु शत-बला प्रसारणी जैसे तेल की अनुवासन बस्ति उपयोगी है।
  3. वात प्रकोप का प्रधान कारण स्रोतावरोध माना गया है। अतः बीच-बीच में दशमूल-त्रिफला आदि से निर्मित निरूह बस्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। स्रोतावरोध को दूर करने के लिए माधुतैलिक बस्ति लाभकारी है। इसके अलावा स्नेहन, स्वेदन, पिंषिचल धारा चिकित्सा के अच्छे परिणाम मिलते हैं। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के रुग्णों को वर्ष में 3-3 माह के अंतर में पंचकर्म जरूर करना चाहिए, जिससे उनका जीवन सुखमय रहता है।

योग चिकित्सा

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के रोगियों को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि सक्रियता है जीवन है। अंग-प्रत्यंग को निरंतर सक्रिय रखने के लिए योगासन बेहतर उपाय है। योगासन द्वारा मांसपेशियों में निरंतर हरकत बनी रहती है। वे गतिशील सक्रिय बनी रहती हैं। मांसपेशियों को सक्रिय बनाकर उसके टोन को सुरक्षित रखना ही डिस्ट्रॉफी को नियंत्रित करने का उपचार है। योगासन के द्वारा शरीर को आड़े, तिरछे, तोड, मरोड़कर आसन नहीं करें। डिस्ट्रॉफी के रोगियों को किसी विशेषज्ञ के निर्देशन में पेशियों की क्रियाशीलता बढ़ाने, सभी जोड़-संधियों पर बिना अतिरिक्त बल या दबाव के उन्हें गतिशील बनाए रखना, बलपूर्वक आसन नहीं करना आदि सावधानी रखते हुए आसन करना चाहिए। आसनों में संधि संचालन की सहज क्रियाएं, जानुशीर्षासन, पश्चिमोत्तानासन, लेटकर उदर शक्ति विकासक क्रिया, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, मेरुदंड स्नायु शक्ति विकासक के 5 आसन शलभासन, भुजंगासन, नौकासन, मत्स्यासन तथा धनुरासन करें। योगासन की विस्तृत जानकारी लेखक द्वारा लिखित ‘योगासन-स्वस्थ्य जीवन का शिल्पकार’ से प्राप्त करें।

प्राणायाम भी लाभकारी

रीढ़ को सीधा रखते हुए चलें, बैठें तथा सोयें। नरम बिस्तर पर सोने की अपेक्षा दृढ़ एवं सख्त तख्त पर पतला गद्दा बिछाकर सोयें ताकि मांसपेशियों पर व्यर्थ के तनाव, दबाव से सिकुड़न पैदा नहीं हो। एक्सर साइकिल तथा तैरना भी श्रेष्ठतम व्यायाम हैं। बैठ या लेटकर पैरों तथा हाथों को साइकिल चलाने जैसे अंदाज में व्यायाम करें। डिस्ट्रॉफी के रोगियों में प्राणायाम बहुत ही उपयोगी पाया गया है। अनुलोम-विलोम, उज्जयी तथा गर्मी के मौसम में शीतली एवं सीत्कारी प्राणायाम करें। भस्त्रिका प्राणायाम के मस्कुलर डिस्ट्रॉफी में श्रेष्ठ परिणाम मिले हैं। इसे बैठकर अथवा अशक्तावस्था में लेटकर भी किया जा सकता है। इससे विकृतिजन्य अपंगता, तन्तु सिकुड़न (कान्ट्रैक्चर) कम होता है। इन प्राणायामों से डायफ्राम की पेशियों का निष्क्रिय होना तथा सांस क्रिया में अनुरोध होते हैं। इसे प्राणायाम द्वारा काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। मस्लर डिस्ट्रॉफी प्रबंधन में निम्नलिखित व्यायाम उपयोगी सिद्ध हुए हैं, जिन्हें पूर्ण सतर्कता के साथ करना आवश्यक है।

  1. पैरों की अंगुलियों का सूक्ष्म व्यायाम करें।
  2. अब टखनों का सूक्ष्म व्यायाम 10 बार करें।
  3. टखनों को उसकी धुरी पर वृत्ताकार घुमाएं।
  4. घुटने को सहजता से मोड़ें व फैलाएं।
  5. घुटने को गोलाकार घुमाएं।
  6. रीढ़ को दाएं-बाएं मोड़ें। दाहिने पैर को बाएं हाथ से तथा बाएं पैर को दाहिने हाथ से पूरी सजगता से स्पर्श करें।
  7. सुखासन में बैठकर लंबी सांस लें व छोड़ें। श्वासोच्छवास पर ध्यान केंद्रित करें।
  8. हाथ की मुट्ठियों को कसें।
  9. कलाई मोड़ें तथा जोड़ को पूरी सजगता से घुमाएं।
  10. कंधों को मोड़ें व फैलाएं।
  11. कंधों को गोलाकार घुमाएं।
  12. गर्दन को सहजता एवं सजगता से गोलाकार घुमाएं।

भावनात्मक उपचार

ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से ग्रस्त बच्चों की बुद्धि, स्मरण, मेधा तथा धैर्य-शक्तिं अत्यंत विकसित एवं प्रायः सामान्य से अधिक पायी जाती है। रोगी के मन में किसी प्रकार की हीन, नकारात्मक एवं रोग संत्रस्त विषाद की भावनाएं नहीं पनपने देना चाहिए। जहां तक संभव हो, रोगी अपना काम स्वयं करें। स्वावलंबन एवं स्वतंत्रता को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाकर, रोगी दूसरों पर परावलम्बी होने की भावना से मुक्त हो जाएं। रोगी के द्वारा किए गए कार्य की सफलता पर शाबाशी दें। ऐसा करने से उसके जीवन में जीने की चाह जागेगी और जीवन की नई राह मिलेगी। रोगी यथासंभव प्रसन्न चित्त रह सके, ऐसा प्रयास किया जाए। रोगी की सृजनात्मक प्रवृत्ति द्वारा नकारात्मक सोच पर नियंत्रण होता है व स्वावलंबन की इच्छा प्रबल होती है।

आहार चिकित्सा

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी की पीड़ा को कम करने के लिए आहार चिकित्सा अत्यंत उपयोगी है। धूम्रपान, शराब, विटामिन ई की कमी आदि से पेशियां शिथिल, कमजोर, निष्क्रिय एवं कठोर होने व सिकुड़ने लगती हैं। डिस्ट्रॉफी के रोगियों में पेशियों के अंतर्गत कैल्शियम की मात्रा 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, वहीं मैग्नेशियम की मात्रा 42 प्रतिशत तक कम हो जाती है। उनकी मांसपेशियों में विशेष प्रोटीन तत्व की कमी से मांसपेशियां अपनी सारी क्षमता खोने लगती हैं। अतः रोगी को प्राकृतिक आहार देने से रोग को काफी हद तक नियंत्रित करने में सफलता मिली है। औहार में समुद्री भोजन (मछली), दालें, जैतून का तेल, हरी सब्जियों का सेवन अधिक करें। फलों में चेरी, ब्लूबेरी लाभदायी हैं। रिफाइंड आहार, कैफीनयुक्त पदार्थ व अल्कोहल का प्रयोग कम करें।

यह वंशानुगत रोग है, जिसमें प्रायः मां इस रोग की वाहक होती है। इस व्याधि की वाहक (Carrier) माता के बच्चों में 50 प्रतिशत यह रोग होने की संभावना होती है। हालांकि लड़कियां इस रोग की वाहक होती हैं, पर 80 प्रतिशत लड़कियों में इस रोग के कोई लक्षण नहीं होते तथा 50 प्रतिशत रुग्णों में उसकी पुत्री भी इस घातक रोग की वाहक हो सकती है। उन्हें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि उनकी संतान को भी यह रोग हो सकता है। इसके लिए गर्भधारण करने से पहले पूरी जांच कराकर उचित निर्णय लेना चाहिए। रोग होने पर आयुर्वेदिक औषधि, पंचकर्म व योग द्वारा मांसक्षरण को न केवल विलम्बित किया जा सकता है, बल्कि यदि रोग का प्रारंभिक अवस्था में उचित इलाज किया जाए, तो उसे रोका भी जा सकता है। आयुर्वेद चिकित्सा से रोगी की मांसपेशी की क्षमता को बढ़ाकर जीवन के कुछ सुखद वर्ष और बढ़ाए जा सकते हैं।

डॉ. जी. एम. ममतानी
एम.डी. (आयुर्वेद पंचकर्म विशेषज्ञ)

‘जीकुमार आरोग्यधाम’,
238, गुरु हरिक्रिशनदेव मार्ग,
जरीपटका, नागपुर-14