
स्त्री जीवन का महत्वपूर्ण काल रजोदर्शन होता है, जिसमें प्रथम बार 14-15 वर्ष की आयु में उसे रजःस्राव होता है। इससे पहले वह बालिका होती है। रजोदर्शन का तात्पर्य ही है कि स्त्री गर्भधारण योग्य हो चुकी है। ऐसे वक्त कई शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं। प्रत्येक माह वह मासिक धर्म से होती है। यही स्त्रीबीज निर्मिति का काल है। इस अवस्था में स्त्री पूर्णतः सबल व सक्षम होती है। करीब 40-45 वर्ष तक यह चक्र अनवरत चलता रहता है। इसके पश्चात एक स्थिति ऐसी आती है जब स्त्री की प्रौढ़ावस्था में एक आवश्यक परिवर्तन आता है। 40-45 वर्ष की उम्र में रजःस्राव धीरे-धीरे बंद होकर पूर्णतः समाप्त हो जाता है। इसे ही रजोनिवृत्ति काल या मेनोपास (menopause) कहते हैं। शारीरिक परिवर्तन की इस अवधि की जानकारी होना निहायत जरूरी है।
जिस प्रकार रजोदर्शन काल का महत्व है उसी प्रकार स्त्री जीवन के इस महत्वपूर्ण समय को भी नकारा नहीं जा सकता। इस अवस्था में 1-2 वर्ष पूर्व से ही हार्मोन असंतुलन से कुछ समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसे प्रीमेनोपॉजल सिन्ड्रोम (Premenopausal syndrome) कहते हैं। इस काल का अपना ही महत्व है। कुछ महिलाओं का तो यह समय आराम से गुजर जाता है, परंतु कुछ स्त्रियों को इस काल में अनेक उपद्रवों का सामना करना पड़ता है। कई महिलाओं को इस बात की सही जानकारी नहीं होती। कई महिलाओं के मन मे यह गलत धारणा है कि इस समय कोई लक्षण प्रकट नहीं होते। यदि कोई लक्षण दिखाई दे तो समझती हैं कोई गडबड़ी है। मासिक के प्रारंभ व समाप्ति में ईस्ट्रोजन कारणीभूत है।
ऐसे शुरू होता है परिवर्तन
ईस्ट्रोजन (Oestrogen) एक प्रकार का स्त्री हार्मोन है, जो डिंब ग्रंथि (Ovary) से निकलता है। डिंब ग्रंथि से निकलने वाला अन्य हार्मोन प्रोजेस्ट्रान (Progesteron) है। ईस्ट्रोजन हार्मोन स्त्रियों में गर्भ के विकास, महिलाओं के वक्षस्थल एवं योनि के विकास तथा अन्य स्त्रियोचित गुणों के लिए आवश्यक है। यह रक्त कोलेस्ट्राल को भी संतुलित रखता है। 50 वर्ष की आयु के आसपास डिंब ग्रंथियां प्राकृतिक रूप से सिकुड़कर छोटी हो जाती है। तब इस हार्मोन का स्राव भी कम होने लगता है।
रजोनिवृत्ति के बाद डिंब ग्रंथियां काम करना बंद कर देती हैं, जिससे प्रोजेस्ट्रान और ईस्ट्रोजन नामक हार्मोन्स का बनना बंद हो जाता है। ये दोनों हार्मोन महिला को कई रोगों एवं शारीरिक विकृतियों से बचाते हैं। ईस्ट्रोजन हार्मोन का बनना बंद हो जाने से हड्डियों के घनत्व में कमी आने लगती है और उनका क्षय होने लगता है। इससे ओस्टियोपोरोसिस होने की आशंका उत्पन्न हो जाती है। हालांकि इस उम्र में भी हड्डियों की बनावट में कोई फर्क नहीं आता है लेकिन अस्थि मज्जा और हड्डियों के घनत्व में कमी आने लगती है। हड्डियों के दिनोंदिन भुरीभुरी होते जाने के कारण वे जरा-सा भी जोर पड़ने पर टूट जाती हैं। यहां तक की खांसने या छींकने पर भी हड्डियों के टूटने की आशंका होती है।
इस उम्र में महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) की समस्या सामान्य तौर पर पाई जाती है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ पाचनतंत्र की नलियां भी शिथिल हो जाती हैं। इससे कब्ज, एसिडिटी और गैस की समस्या उत्पन्न होने लगती है। इस उम्र में व्यायाम नहीं करने से वजन बढ़ने के कारण भी कई समस्याएं पैदा होती हैं। खास तौर पर महिलाएं रजोनिवृत्ति के बाद होने वाली समस्याओं के कारण चिड़चिड़ी हो जाती हैं।
इंस्ट्रोजन की कमी के कारण नाभि से मिलकर जननांगों के ऊतकों का क्षय होने लगता है। गर्भाशय सिकुड़कर छोटा हो जाता है। गर्भाशय के स्नायु ढीले व कमजोर होने से गर्भाशय अपने स्थान से खिसक सकता है। जिसे गर्भाशय अंश (Prolapse of Uterus) कहते हैं। मूत्राशय तथा मूत्रनली प्रभावित होकर बार-बार पेशाब की इच्छा होती है। पेशाब रोकने की क्षमता कम होती जाती है। मांसपेशियां कड़क तथा त्वचा खुश्क हो जाती है।
लक्षण

रजोनिवृत्ति काल का महत्वपूर्ण लक्षण है कभी उष्णता का अनुभव तो कभी शीतलता की प्रतीति होना। कई महिलाओं में यौनाचरण की स्थिति में कमी आती है। इसके अलावा हथेली और तलवों में जलन होना, कमर दर्द, अनिद्रा, स्तनों में दर्द होना, मासिक धर्म का अनियमित होना, खांसी होना व खांसने से या बहुत जोर से हंसने से मूत्र प्रवृत्ति होना इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं। सारे शरीर की त्वचा शिथिल हो जाती है, विशेषतः चेहरे की। ये सभी समस्याएं किसी के जीवन में शीघ्र ही दृष्टिगोचर होती हैं तो कोई महिला इन तकलीफों से धीरे-धीरे परेशान होती है। इस स्थिति में पहुंचते तक महिलाएं जिम्मेदारियों से सर्वथा मुक्त होती हैं। ऐसे समय में वे काफी अकेलापन महसूस करती हैं। शरीर पूर्ववत चुस्त तंदुरुस्त नहीं रहता। इस काल में चिड़चिड़ापन, क्रोध, तनाव, मानसिक अवसाद, अनिद्रा आदि तकलीफें होती हैं।
अधिकांश महिलाओं में पूर्व रजोनिवृत्ति काल (Premenopausal Syndrome) 3 से 5 वर्ष तक चलता है। इसमें 2 रजोस्राव के मध्य का अंतर बढ़ जाता है। कुछ महिलाओं में रक्त स्राव कम तो किसी में अधिक होता है। एक वर्ष तक लगातार मासिक धर्म न होने पर रजोनिवृत्ति माना जाता है। रजोनिवृत्ति की पीड़ा को बढ़ाने वाले घटकों जैसे- उत्तेजक मिर्च मसाले, फास्टफूड, शराब, चाय, धूम्रपान, व्यायाम का अभाव, मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह आदि के कारण रजोनिवृत्ति काल में तकलीफ बढ़ जाती है।
बनाए रखें आत्मविश्वास
रजोनिवृत्ति एक सामान्य प्रक्रिया है। जो महिलाएं शुरुआत से ही खानपान में नियमित व संतुलित आहार का सेवन करने के साथ ही योगाभ्यास नियमित रूप से करती हैं, उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती है। अधिकांश महिलाओं को रजोनिवृत्ति काल में सांत्वना देकर आत्मविश्वास व मनोबल बढ़ाया जाता है, इससे ही उन्हें लाभ मिलता है। कुछ महिलाओं में खानपान में सुधार, मनोवैज्ञानिक उपचार के माध्यम से ही लक्षणों से मुक्ति मिलती है। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में इसके लिए हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरिपी (HRT) तथा ईस्ट्रोजन रिप्लेसमेंट थेरिपी (ERT) का सहारा लिया जाता है। एच.आर.टी में ईस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान मिलाकर दिया जाता है।
रजोनिवृत्ति की चिकित्सा के अंतर्गत आहार-विहार, व्यायाम, पंचकर्म व औषधि का समावेश होता है।
आहार
दरअसल 40-45 वर्ष के बाद की अवस्था ही वही काल है, जब शरीर में ईस्ट्रोजन हार्मोन कम होते लगता है। इस दौरान शरीर में हार्मोन असंतुलन के कारण अनेक शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं। मेनोपोजल पीरियड (Menopausal Period) में ही हायपर कोलेस्ट्राल, हृदयरोग, ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियां होने की संभावना रहती है। अतः आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कैल्शियम की कमी से ऑस्टियोपोरोसिस होता है। इसलिए आहार में दूध, दही, सोयामिल्क, सोयापनीर, अंकुरित अन्न व ताजे फलों का प्रचुर मात्रा में सेवन करें।
हमारे शरीर की हड्डियां एक बैंक की तरह काम करती हैं। अगर हम युवावस्था में ही अपने आहार के जरिए पर्याप्त कैल्शियम ग्रहण करें, तो शरीर में कैल्शियम का पर्याप्त भंडार हो जाएगा और उम्र बढ़ने पर हमारे शरीर में कैल्शियम की कमी कम होगी और हड्डियां भुरभुरी एवं कमजोर होने से बच सकेंगी। इसलिए जरूरी है कि हम युवावस्था से ही कैल्शियम और आयरन से परिपूर्ण आहार लें। दूध और दुग्ध उत्पादों, अंडे, हरी पत्तेदार सब्जियों, खजूर, मशरूम, अंजीर, अंकुरित दाल, मटर और शकरकंद में कैल्शियम एवं लौह तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं।
हरी सब्जियां, फल, अनार, चुकंदर, अंकुरित अन्न, गुड़ आदि में प्रचुर मात्रा में आयरन होता है। लोहे के बरतनों में खाना पकाएं। फलों व सब्जियों को काटने से पहले धोएं। शीतल पेय का प्रयोग करने से शरीर में कैल्शियम की मात्रा कम होती है। अतः इनके प्रयोग से बचें।
शरीर में कैल्शियम और आहार के अवशोषण के लिए संतरा, आंवला और नींबू जैसे विटामिन सी से परिपूर्ण आहार लेना आवश्यक है। अस्थि ऊतकों के निर्माण में सहायता करने के लिए प्रोटीनयुक्त आहार भी लेना जरूरी है। दूध, अंडा, चीज, छिलके वाली दालें, अनाज, सोयाबीन, मछली, अंडे और सूखे मेवे में प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होता है। 40 की उम्र के बाद अंडे का सफेद भाग ही प्रयोग करें। तेल का प्रयोग अल्प प्रमाण में करें। घी की बजाय सोयाबीन, मूंगफली, सरसों के तेल का प्रयोग कर सकती हैं। कब्ज दूर करने के लिए अधिक रेशेदार आहार जैसे-ताजे फल और सब्जियों का सेवन करना चाहिए। इसके अलावा काफी मात्रा में पानी पीना भी फायदेमंद रहता है।
50 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं में उच्च रक्तचाप की समस्या भी सामान्य रूप से पाई जाती है। ऐसे में उन्हें अचार, पापड़, चिप्स और डिब्बाबंद आहार का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा बढ़ती उम्र के साथ पकोड़े, मिठाइयों जैसे वसायुक्त पदार्थ न खाएं। यह चीजें अम्लता, मोटापा और गैस की समस्या पैदा करती हैं। अधिक उम्र की महिलाओं को ऐसा भोजन लेना चाहिए जो मसालेदार नहीं हो और आसानी से पचने वाला हो। उन्हें विटामिन ‘ए’ से परिपूर्ण आहार लेना चाहिए। इसके अलावा बारीक सफेद आटे की जगह चोकरयुक्त आटे और पालिश किए हुए चावल की जगह पालिशरहित चावल का उपयोग करें।
इस तरह इस उम्र में विटामिन, खनिज पदार्थ, रेशे, प्रोटीन, जटिल कार्बोहाइड्रेट तथा वसारहित आहार लेना चाहिए। इसके अलावा प्रचुर मात्रा में तरल पदार्थ भी लेना चाहिए। महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं को रजोनिवृत्ति का इंतजार किए बगैर युवावस्था से ही अपने खानपान पर ध्यान देना चाहिए ताकि रजोनिवृत्ति के बाद उन्हें कम से कम समस्याओं का सामना करना पड़े।
व्यायाम

खानपान में सुधार के अलावा व्यायाम करना भी सेहत के लिए जरूरी है। इस उम्र में प्रतिदिन आधे से एक घंटे तक तेज गति से चलना सबसे अच्छा व्यायाम है।
किशोरावस्था से ही योगासन, प्राणायाम, ध्यान आदि योग की क्रियाएं करने से रजोनिवृत्ति काल में इन सभी तकलीफों का एहसास ही नहीं होता क्योंकि योगासन हार्मोन का संतुलन बनाए रखता है। योगासन में जानुशिरासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, पश्चिमोत्तानासन, उष्ट्रासन, सुप्त वज्रासन, उत्तानपादासन, शलभासन, भुजंगासन, नौकासन, शवासन इत्यादि उपयोगी आसनों का नियमित अभ्यास करने से रजोनिवृत्ति काल के दौरान परेशानी नहीं होती है। प्राणायाम में अनुलोम विलोम, दीर्घ श्वसन व उज्जयी प्राणायाम करें। ध्यान का प्रयोग भी नियमित रूप से करें।
पंचकर्म

रजोनिवृत्ति काल में मासिक धर्म से संबंधित तकलीफ व शरीर की अन्य तकलीफों के लिए पंचकर्म के अंतर्गत स्नेहन, स्वेदन, बस्ति, शिरोधारा, उत्तरबस्ति इत्यादि कर्मों का महत्वपूर्ण योगदान है। पंचकर्म चिकित्सा ईस्ट्रोजन की कमी के कारण होने वाली तकलीफों में उपयोगी सिद्ध हुई है। कई महिलाओं को रजोनिवृत्ति काल में संधिगत रोग जैसे कमर दर्द, घुटनों का दर्द, पीठ दर्द आदि की तकलीफ होती है। इसमें स्नेहन, स्वेदन व बस्ति चिकित्सा लाभदायी है। इस काल में पाचन संस्थान संबंधी तकलीफें जैसे कब्ज, एसिडिटी, अपचन में बस्ति देने से लक्षणों में कमी आती है। ईस्ट्रोजन की कमी के कारण महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण मिलते हैं। अतः ऐसी रुग्णा स्नेहन, स्वेदन व बृहणबस्ति कर्म के उत्तम परिणाम मिलते हैं। इस चिकित्सा में अस्थिधातु को पुष्ट करने वाली औषधि बस्ति क्रिया के माध्यम से शरीर में प्रविष्ट की जाती है ताकि अस्थियां खोखली होने से बचें। रजोनिवृत्ति काल में कई महिलाओं को तनाव (Depression), एंग्जाइटी (Anxiety) इत्यादि लक्षण विचलित करते हैं, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन गुस्सा आना, भय प्रतीत होना इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में पंचकर्म की शिरोधारा, नस्य चिकित्सा लाभदायी है। इससे महिला का मानसिक स्वास्थ्य बरकरार रहता है। पंचकर्म की उक्त सभी क्रियाएं कम से कम 21 दिन तक करने से लाभ मिलता है। अतः पूर्व रजोनिवृत्ति काल (Premenopausal Syndrome) की शुरुआत होते ही 40 की उम्र पार करने के बाद प्रत्येक महिला को पंचकर्म की उपरोक्त क्रियाएं अवश्य करनी चाहिए ताकि रजोनिवृत्ति में होने वाली तकलीफ अधिक न हो।
औषधि
आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र औषधियों का अथाह सागर है। औषधि चिकित्सा के अंतर्गत इसमें बाल्य व मेद्य औषधियां देते हैं। रजोनिवृत्ति के कारण उत्पन्न तकलीफों में ब्राह्मी वटी 1-1 सुबह-शाम लें। साथ ही सारस्वतारिष्ट 2 चम्मच, अशोकारिष्ट 2 चम्मच में 4 चम्मच पानी मिलाकर लें। प्रवाल भस्म 1 रत्ती सुबह-शाम लेने के साथ ही शतावरी चूर्ण 1-1 चम्मच सुबह-शाम दूध के साथ लेने से लाभ होता है। उक्त औषधि चिकित्सक के परामर्शानुसार लें। इससे निश्चित रूप से तकलीफ दूर होगी।
रजोनिवृत्ति प्रकृति का नैसर्गिक नियम और शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया है। इससे डरने या भयभीत होने की जरूरत नहीं। कुछ महिलाओं के मन में यह धारणा होती है कि यौन जीवन पर रजोनिवृत्ति का प्रभाव पड़ता है। परंतु इतना नहीं पड़ता जितना सोचा जाता है। अतः आत्मविश्वास के साथ इस स्थिति का सामना करें। इसे सहज रूप में लें। इसे रोग न समझें बल्कि स्त्रीजीवन की परिपूर्णावस्था समझें। स्त्रियां इस काल में हल्का सुपाच्य आहार लें, नियमित रूप से योगाभ्यास व प्राणायाम करें तथा खुद को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रखने का प्रयास करें। सदैव शांत, तनावरहित व प्रफुल्लित अवस्था में रहें। चूंकि यह कोई रोग नहीं, अतः पंचकर्म के द्वारा शरीर शुद्धि कर लक्षणों से निजात पाई जा सकती है।
सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि 42 से 50 वर्ष की आयु में लगभग 15 प्रतिशत महिलाओं में रजोनिवृत्ति संबंधी लक्षण इतने उग्र होते हैं कि उन्हें डॉक्टर के पास जाना ही पड़ता है। 25 प्रतिशत महिलाओं को इससे संबंधित किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती। 60 प्रतिशत महिलाओं को रजोनिवृत्ति के कारण कुछ समय के लिए परेशानी होती है।

डॉ. अंजू ममतानी
‘जीकुमार आरोग्यधाम’
238, गुरु हरिक्रिशनदेव मार्ग,
जरीपटका, नागपुर


