हिपेटाइटिस लिवर मे सूजन

कार्य
पाचन : इसके द्वारा पित्त तैयार किया जाता है, जो वसा को टुकड़ों में विभाजित करता है।
चयापचय : खाद्य पदार्थों को पौष्टिक तत्वों में परिवर्तित करता है।
मल-उत्सर्जन (एक्सक्रीशन) : शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है।
विषहरण (डिटॉक्सीफिकेशन) : विषाक्त उत्पादों को कम विषाक्त तत्वों में परिवर्तित करता है।
भंडारण : विटामिन, खनिज और शर्करा का भंडारण करता है।
लोग अपने लिवर के बारे में तब विचार करते हैं, जब यह ठीक से काम नहीं करता है क्योंकि इसके द्वारा किए जाने वाले किसी कार्य को हृदय की धड़कन, नाड़ी या श्वसन दर की तरह जांचा नहीं जा सकता है। वर्तमान समय में परिवर्तनशील जीवनशैली, खानपान की पसंद, सामान्य विषाक्तताओं (टॉक्सिन) तथा पर्यावरणीय विषाक्तताओं के परिणामस्वरूप लिवर को आवश्यकता से अधिक काम करना पड़ता है। अतः पहले की तुलना में लिवर पर शरीर से विषाक्त तत्वों को बाहर करने के लिए कहीं अधिक बोझ पड़ता है। लिवर के रोगग्रस्त हो जाने पर महत्वपूर्ण कार्य बाधित हो जाते हैं।

लिवर को प्रभावित करने वाली वस्तुएं-
• रोग प्रतिरक्षा क्षति ।
• संक्रमण ।
• वायरस ।
• बैक्टीरिया ।
• फंगस और प्रोटोजोआ ।
• विषाक्त क्षति ।
• अल्कोहल ।
• दवाएं ।
• रसायन / विष ।
• अन्य कारण ।

लिवर के रोग
• वायरल हिपेटाइटिस (Viral Hepatitis)
• विषाक्त तथा दवा के कारण होने वाला हिपेटाइटिस (Drug Induced Hepatitis)
• अल्कोहल जनित लिवर रोग (Alcoholic Hepatitis)
• पूर्व-सूत्रण रोग (सिरोसिस) स्थितियां या प्रारंभिक सूत्रण रोग (Pre-Cirrhosis)
• गैर-अल्कोहलजन्य वसायुक्त लिवर के रोग |(Non Alcohlic Fatty Liver Diseases)
वैश्विक रूप से 10 में से एक व्यक्ति लिवर, पित्त, पित्तवाहिका (नली) या पित्ताशय के रोगों से पीड़ित है।

हिपेटाइटिस


हिपेटाइटिस लिवर की सूजन होती है, जिसके कारण यह भलीभांति काम करना धीरे-धीरे बंद कर देता है, जिससे पित्त (बिलीरुबिन) रक्त की धारा में चला जाता है। इससे यकृत कोशिका की झिल्ली को क्षति पहुंचती है। कोशिका में से एंजाइम बहकर बाहर आ जाते हैं। एक अध्ययन में लगाए गए अनुमान के अनुसार 1,00,000 की जनसंख्या में 244 वार्षिक रूप से पीलिया से प्रभावित होते हैं। पीलिया के लगभग 95% मामले गर्मियों और मानसून के महीनों में होते हैं। 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों में पीलिया की व्याप्ति सर्वाधिक पाई जाती है (प्रति 1000 में 3.7), जिसमें आयु बढ़ने के साथ काफी अधिक गिरावट दिखाई देती है।
आयुर्वेदानुसार यह रंजक व पाचक पित्त का विकार है, जिससे यकृत व रक्तवह संस्थान प्रभावित होता है। यह मुख्यतः बैक्टीरिया, वायरस व अमीबा से होने वाला विकार है। यह Drugs के Toxins जैसे Butazolidins, Alcohol, न्यूमोनिया व सेप्टीसेमिया के संक्रमण से भी होता है। वायरल हिपेटाइटिस अत्यंत खतरे वाला होता है, इसमें से Hepatitis A का संक्रमण, संक्रमित आहार व जल से होता है, जबकि वायरल हिपेटाइटिस बी, सी, ई संक्रमण रक्तदान व यौन संपर्क के द्वारा होता है।

प्रकार
लक्षणों के आधार पर हिपेटाइटिस के 2 प्रकार हो सकते
तीव्र लक्षण (Acute Hepatitis): यह 6 महीने से अधिक नहीं होता। इसमें फ्लू जैसे लक्षण, शरीर की मांसपेशियों व जोड़ों में दर्द, उलटी, दस्त, सिरदर्द, चक्कर आना, कमजोरी, थकान, भूख न लगना, पेशाब का गाढ़ा एवं पीला होना, आंखों व त्वचा का पीलापन, पीलिया, यकृत का बढ़ जाना, यकृत में सूजन होना, लिम्फ ग्रंथियों एवं प्लीहा का बढ़ जाना।
एक्यूट वायरल हिपेटाइटिस मुख्यतः युवावस्था में होता है। वायरल इन्फेक्शन के बाद 7-10 दिन में पूर्ण लक्षण आने लगते हैं, जो कुल 2-6 सप्ताह तक रहते हैं। उचित इलाज के अभाव में एक्यूट यकृत मृत्यु (Liver Failure) होती है, जिसमें यह विषैले तत्वों को परिवहन तंत्र से निकालने में असमर्थ हो जाता है और हिपेटिक एनसिफेलोपेथी हो जाती है। इस स्थिति में खून में प्रोटीन बढ़कर पेरिफेरल सूजन (Oedema) एवं रक्त प्रवृत्ति करता है, जिससे पूर्णतया यकृत मृत्यु एवं रोगी की मृत्यु तक हो सकती है।
जीर्ण यकृत शोथ (Chronic Hepatitis) : यदि हिपेटाइटिस 6 महीने से अधिक रहता है तो क्रोनिक कहलाता है। मुख्यतः यह खून की जांच से सामने आता है। इसमें थकान, कमजोरी, यकृत के बढ़ने, सूजन के साथ, यकृत में सिरोसिस, वजन कम होना, पैरों में सूजन, पेट में पानी भरना (एसाइटिस), इसोफेगस में रक्तवाहिनियों के बढ़ जाने से रक्त प्रवृत्ति बढ़कर मृत्यु तक हो जाती है। हिपेटिक इनसिफेलोपेथी (कन्फ्यूजन एवं कोमा) एवं हिपेटोरीनल सिन्ड्रोम (किडनी डिस्फंक्शन) भी हो जाता है। इसके साथ महिलाओं में स्वतः रोग प्रतिरोधक क्षमता (Autoimmune Hepatitis) की कमी, युवान पीड़िका (एक्ने), अनियमित माहवारी, फुफ्फुस स्कारिंग, थायरॉइड ग्रंथियों में शोथ, वृक्कशोथ भी होता है।
आधुनिक शास्त्रानुसार हिपेटाइटिस के 6 प्रकार होते है।
• हिपेटाइटिस-ए
• हिपेटाइटिस-सी
• हिपेटाइटिस-ई
• हिपेटाइटिस-बी
• हिपेटाइटिस-डी
• हिपेटाइटिस-जी

इनमें से हिपेटाइटिस ए व बी के रुग्ण अधिक संख्या में मिलते हैं।

हिपेटाइटिस-ए
यह सामान्यतः इन्फेक्शियस हिपेटाइटिस कहलाता है। यह यकृत की एक्यूट बीमारी है, जो हिपेटाइटिस A (HAV) वायरस द्वारा होती है। यह संक्रमित व्यक्ति से, संक्रमित भोजन एवं संक्रमित जल से होता है। संक्रमण एवं लक्षणों के उत्पन्न होने के लिए 2-6 सप्ताह या औसतन 28 दिन का समय (इन्क्युबेशन पीरियड) लगता है। वातावरण व जीवनशैली में फैले विभिन्न संक्रमणों का प्रभाव उन पर अधिक होता है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. जैसे बच्चे, गर्भिणी या दूध पिलाती माता। वास्तव में हिपेटाइटिस-ए के लक्षण 90% संक्रमित रोगियों में प्रकट ही नहीं होते। बचपन में हुआ हिपेटाइटिस-ए कई बार जिंदगी भर रोग प्रतिरोधक क्षमता भी छीन लेता है।

HAV संक्रमण मुख्यतः स्वयं ही नियंत्रित हो जाता है क्योंकि स्वाभाविक तौर पर हमारा शरीर संक्रमण के प्रति लड़ने की ताकत देता है। लेकिन 10-15 प्रतिशत रोगियों में वह संक्रमण पहले के एक्यूट रोगावस्था के 6 महीने के भीतर ही दोबारा हो जाता है। लेकिन एक्यूट यकृत की मृत्यु हिपेटाइटिस-ए से तकरीबन न के बराबर ही रहती है. संक्रमण की घातकता मुख्यतः रोगी की उम्र के साथ बढ़ती जाती है। हिपेटाइटिस-ए की रोकथाम हिपेटाइटिस-ए वैक्सीन से सफलतापूर्वक की जा रही है।
हिपेटाइटिस-ए दूषित जल-जनित विकार है, जो कि
महामारी का रूप ले लेता है। यह अचानक होता है व इसके लक्षण गंभीर व अल्पकालिक होते हैं। इसमें मृत्यु दर कम होती है। इसके निम्नलिखित लक्षण होते है-
त्वचा/आंख की पुतलियों/ नाखूनों/मूत्र का पीलापन।
मूख का अभाव / मतली।
शरीर का वजन कम होना।
कमजोरी।
बुखार ।
बढ़ा हुए लिवर एंजाइम स्तर।

हिपेटाइटिस-बी
आजकल जिस रोग की सर्वाधिक चर्चा है, वह है हिपेटाइटिस-बी। यह रोग खासतौर से बच्चों में होता है, परंतु लापरवाही के चलते बड़ी उम्र के व्यक्ति भी इसका शिकार हो सकते हैं। इसलिए चिकित्साशास्त्री इसे खामोश शत्रु कहते हैं। हिपेटाइटिस बी संक्रमण, लिवर की एक गंभीर बीमारी है, जो हिपेटाइटिस बी वायरस (एच.बी.वी.) के कारण होती है। यह भारत में एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। भारत में HBsAg के वाहकों की संख्या 40 मिलियन (4 करोड़) से अधिक होने का अनुमान लगाया गया है। इस संक्रमण से ग्रस्त एक मिलियन नए मामलों का हर वर्ष पता लगाया जाता है।

भारत में रक्तदाता, अंग प्रत्यारोपण व नशीले ड्रग्स का उपयोग करने वाले व्यक्ति, सेक्स वर्कर आदि इसके सर्वाधिक वाहक हैं। इसके अलावा अस्पताल के औजार और सुइयां भी इसकी वाहक बनती हैं। डायलिसिस, सर्जरी, संक्रमित रेजर से भी हिपेटाइटिस-बी के होने की संभावना रहती है। यह अन्य माध्यमों से भी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित होता है। इनमें बाधित मां द्वारा नवजात शिशु में तथा बाधित व्यक्ति से सेक्सुअल संबंध बनाया जाना प्रमुख हैं। यही नहीं, स्वास्थ्य सेवा से जुड़े सर्जन, पैथॉलॉजिस्ट और फिजिशियन भी इससे कभी भी बाधित हो सकते हैं। ज्यादातर इन्हीं लोगों के एच.बी.वी. बाधित होने की संभावना होती है। इससे बाधित व्यक्ति का पता एच.बी.एस. विषाणु के तंतुओं या डी. एन.ए. तकनीक द्वारा लगाया जाता है।
इस रोग की रोकथाम के लिए हिपेटाइटिस-बी सरफेस एंटीजेन (HBsAg) हिपेटाइटिस वायरस ‘बी’ के लिए बच्चों या बड़ों में 3 डोज में दिया जाता है। इससे हिपेटाइटिस-बी संक्रमण से रोकथाम मिलती है, जो 25 वर्ष तक चलती है। इस रोगो से आजीवन संक्रमण, सूत्रण रोग (सिरोसिस), लिवर कैंसर, लिवर द्वारा काम न करना और मृत्यु तक हो सकती है।
लक्षण : इस रोग में जो लक्षण उभरते हैं, उनमें प्रारंभिक लक्षण ज्यादा जटिल होते हैं। यह इतने मामूली होते हैं कि इनसे पता ही नहीं चलता है कि व्यक्ति एच.बी.वी. का शिकार है या नहीं। धीरे-धीरे यह रोग बढ़कर पीलिया के रूप में सामने आता है। इससे लिवर फेल होने अथवा लिवर कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। आश्चर्यजनक बात यह है कि एच.बी.वी. बाधित 70 प्रतिशत व्यक्तियों में पीलिया के आंशिक लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। सिर्फ 30 प्रतिशत लोगों में ही इस बीमारी में पीलिया सामने आता है।
हिपेटाइटिस-बी 2 प्रकार से फैलता है-
1) Perinatal (Vertical) – जन्म के समय (पेरिनटाल) एच.
बी.वी. के फैलने का खास तरीका मां से नवजात शिशु को होता है।
2) Horizontal : त्वचा द्वारा, रक्तदान (Blood Transfusion), पारिवारिक सदस्यों से संपर्क तथा यौन संपर्क (Sexual Transmission) तरीके शामिल हैं।
इस बीमारी में जिन लोगों का लिवर फेल होता है, ऐसे 80 प्रतिशत रोगी लिवर प्रत्यारोपण के अभाव में मर जाते हैं। इसके रोगी में रोग की विभिन्न अवस्थाएं वाहक से शुरू होकर व्यक्ति की मौत तक देखने को मिलती हैं। शराब पीने वाले व्यक्तियों में हिपेटाइटिस बी के शिकार लोगों का प्रतिशत 30 से 50 है। यह एक ऐसी खतरनाक बीमारी है, जो छिपकर अपना असर दिखाती है। इस बीमारी से बचाव के लिए रोग के शुरुआती दौर में ही इसका इलाज हो जाना चाहिए। इसके बचाव का एक ही तरीका है-सावधानी। इसके तहत कोई भी व्यक्ति हिपेटाइटिस बी रोधी टीके 1 से 6 माह के अंतराल में लगवा सकता है। अतिरिक्त बूस्टर डोज भी समय-समय पर लेना जरूरी है।

हिपेटाइटिस-सी

वर्ष 1989 से हिपेटाइटिस सी का अस्तित्व सामने आया है। अक्सर फ्लू जैसे लक्षणों वाला यह रोग लिवर एन्जाइम (ALT & AST) को प्रभावित करता हुआ यकृत-मृत्यु तक कर सकता है। हिपेटाइटिस-सी मुख्यतः कई वायरस के द्वारा हो सकता है, जो खून या शरीर के स्रावों से फैलता है। इस रोग के संक्रमण से लिवर सिरोसिस, कोमा एवं मृत्यु तक हो सकती है। इसका संक्रमण इंट्रावीनस ड्रग, सूची भरण या संक्रमित खून के चढ़ाने अथवा टैटू या शरीर में किसी तरह से संक्रमित नीडिल से गुदवाने से होता है।

दवाजनित हिपेटाइटिस
(Drug Induced Hepatitis)

दवाजनित हिपेटाइटिस में लिवर में सूजन हो जाती है। ऐसा कुछ खास दवाओं का सेवन करने के कारण हो सकता है। कुछ दवाओं की कम से कम खुराकों से भी हिपेटाइटिस हो सकता है, भले ही लिवर की ब्रेकडाउन प्रणाली सामान्य ही क्यों न हो। अनेक दवाओं की बड़ी खुराकों से सामान्य लिवर को क्षति पहुंच सकती है। पहले से यकृत रोग से पीड़ित व्यक्तियों को यह समस्या होने की संभावना सबसे अधिक होती है। 900 से अधिक दवाओं के संबंध में यह माना जाता है कि उनसे लिवर को क्षति पहुंच सकती है, जैसे-
NSAIDs, Steroids, birth Control Pills, Erythromycin, Anti TB drugs, Sulfa drugs. Tetracyclines, Antidiabetic medications, High dose paracetamol, Nimuselide आदि।

अल्कोहलजन्य लिवर रोग
(Alcoholic Hepatitis)

दुनिया में अल्कोहल एक ऐसा एजेन्ट है, जिसका विस्तृत रूप से सर्वाधिक दुरुपयोग होता है। इसका सेवन बियर, वाइन के रूप में किया जाता है। हर रोज 80 ग्राम या अधिक एथोनोल सेवन के कारण महत्वपूर्ण रूप से लिवर को क्षति हो सकती है। भारत में जीर्ण लिवर रोग से पीड़ित रोगियों में से लगभग 50% रोगी अल्कोहलजन्य लिवर रोग से पीड़ित हैं।
क्षति के लक्षण पेट दर्द, मुंह सूखना, अत्यधिक प्यास, थकान, बुखार, पेट में द्रव्य संचयन, जलोदर (Ascites). पीलिया, भूख न लगना, मानसिक भ्रम, मितली. अनचाहे रूप से वजन बढ़ना, त्वचा असामान्य रूप से गहरी या लाइट हो जाना इत्यादि। इसके अलावा लगातार भारी मात्रा में अल्कोहल सेवन के कारण भिन्न-भिन्न स्तरों की क्षति लिवर को क्रमशः पहुंचती है। अल्कोहल संबंधी लिवर रोग से जुड़ी निम्न जटिलताएं आमतौर पर वर्षों तक भारी मात्रा में मद्यपान करने के बाद पैदा होती हैं-
• पेट में द्रव्य संचयन होना (जलोदर)।
• ग्रासनली या पेट की शिराओं में से रक्तस्राव ।
• बढ़ी हुई प्लीहा (Splenomegaly) |
• लिवर में उच्च रक्तदाब (Portal Hypertension) |
• मस्तिष्क संबंधी विकार और गहन बेहोशी (Coma)।
• गुर्दे की विफलता (Renal Failure) 1
• लिवर का सूत्रण रोग (Liver Cirrhosis) |
• लिवर का कैंसर।

लिबर के लिए प्रभाबकारी आयुर्वेदिक औषधियां

लिवर के अनेक गुणों में अद्वितीय गुण यह है कि इसमें स्वयं को फिर से बनाने (रिजनरेट) की क्षमता होती है, तथापि इस प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए यकृत संरक्षात्मक (हिपेटोप्रोटेक्टिव) औषधियों की आवश्यकता होती है। आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र में लिवर को मजबूत बनाने के लिए अनेक वनौषधियों का वर्णन है जैसे कुटकी, भूम्यामलकी, भृंगराज, दारूहरिद्रा, एरण्डमूल, गुडूची, हरीतकी, काकमाची, अपामार्ग, भूनिम्ब (कालमेघ), दुग्धफेनी, कासनी, पारिजात इत्यादि ।

पंचकर्म विकित्सा

पंचकर्म द्वारा कामला रोग से पीड़ित व्यक्ति के स्रोतों का शोधन करना आवश्यक है। पहले दुग्धपान व स्नेहन कराने के बाद एरंड तेल द्वारा रेचन कराएं। मदार की जड़ को तण्डुलोदक के साथ पीसकर नस्य लेने से कामला रोग दूर होता है। गूमा के रस का अंजन भी लाभकारी है। हल्दी, गेरू तथा आंवला का चूर्ण कामला रोगी के ऊपर लेप करें।

औषधि चिकित्सा
दीपन-पाचन औषधि तथा आहार-विहार द्वारा यकृत शोथ में उपचार व्यवस्था है। औषधियों में मुख्यतः आरोग्यवर्धिनीवटी, पुनर्नवादि मंजूर, सूतशेखर रस, चंद्रकला रस, यकृत प्लीहारी रस, ताप्यादि लौह, सुवर्ण वसंत मालती रस, कुमारी आसव, त्रिफलासव, पुनर्नवासव, लोहासव इत्यादि आयुर्वेदिक औषधियां चिकित्सक के मार्गदर्शन में लें।

हिपेटाइटिस रोग में कारगर फलत्रिकादि कादा

आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र में हिपेटाइटिस के लिए प्रभावी फलत्रिकादि काढ़ा का वर्णन हैं, जिसमें आमलकी, विभीतक, हरीतकी, अमृता, वासा, चिरायता, भूनिम्ब व निम्ब इन वनौषधियों को समान मात्रा में लेकर उनको 4 गुना अधिक मात्रा पानी में उबालते हैं। मसलन संपूर्ण औषध की मात्रा अगर 50 ग्राम है, तो उसे 200 मिली पानी में उबाल लेते हैं, जब 50 मिली रह जाए तो इसे छानकर सुबह खाली पेट सेवन करें। इस काढ़े को 1-2 माह नियमित सेवन करने से हिपेटाइटिस से मुक्ति मिलती हुई दिखाई दी है।

घरेलू नुस्खे

पीलिया रोग में एक रत्ती वंगभस्म लेकर एक छोटा चम्मच दूध की मलाई पर डालकर प्रातःकाल खाएं और दोपहर के बाद 3-4 बजे थोड़ी-सी ईसबगोल की भूसी फांककर एक गिलास नींबू का शर्बत पिएं। 2-3 दिनों में पीलिया दूर हो जाएगा। इसका प्रयोग केवल 3 दिन का है।

  • कामला (पीलिया) में त्रिफला (हर्रे, बहेड़ा, आंवला) या गुडूची या दारूहल्दी अथवा नीम का रस मधु मिलाकर प्रातःकाल कामला से पीड़ित रोगी के लिए प्रयोग करें।
  • लौहभस्म, व्योष (सोंठ, पीपर, मरिच), वायविडंग का चूर्ण
  • और हल्दी का चूर्ण तथा त्रिफला का चूर्ण शक्कर मिलाकर कामला रोग से पीड़ित व्यक्ति को चटाएं।
  • इलायची, जीरा तथा मुईआंवला और मिश्री समभाग इन सबको गाय के घी से भावित करें और प्रातःकाल सेवन करें। यह कामला रोग का अच्छी तरह नाश करता है।
  • हल्दी का चूर्ण 10 ग्राम की मात्रा में 50 ग्राम दही के साथ प्रातःकाल सेवन करें।
  • पिप्पली 10 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम, दंतीमूल 10 ग्राम, हरड़ 20 ग्राम और वायविडंग 5 ग्राम सबको बारीक पीसकर कपड़छान करके रख लें। 2 ग्राम शाम को पानी के साथ लें।
  • 2 तोले मेहंदी की पत्तियां रात को पानी में भिगो दें। सबेरे छानकर पिलाने से कुछ दिनों में पीलिया रोग दूर होता 18
  • भृंगराज पत्ते का रस 2 चम्मच दिन में 3 बार लें।
  • पीलिया के कारण शरीर में खुजली होने पर संगजीरा का पाउडर शरीर पर रगड़कर लगाएं। त्रिफला, सोंठ को पानी में मिलाकर लगाएं या वेखंड व कपूर का मिश्रण या कड़वा जीरा व बेसन का मिश्रण या रीठा का पानी लगाएं।
  • यदि यकृत में कड़ापन आ गया हो, तो अमरबेल को जल में उबालकर उस जल से सिंकाई करने तथा उबाली हुई बेल को कुचलकर बांध देने से लाभ मिलता है। अमरबेल के बीज सलकर खाने से भी यकृत एवं तिल्ली रोग में फायदा होता है।
  • यकृत की क्रिया बिगड़ने पर शोथ, बवासीर, अतिसार और कई प्रकार के त्वचा रोग होने लगते हैं। ऐसी दशा में मकोय का सेवन करने से यकृत से जुड़े हुए संपूर्ण रोग धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। जब इसके पत्तों का रस रोगी को दिया जाता है, तो वह आंतों में पहुंचकर वहां एकत्र हुआ विष नष्ट कर देता है। जो विष यकृत में पहुंच जाता है, वह इस रस के असर से मूत्र के माध्यम से बाहर निकल जाता है।

यकृत शोध में सूखी मकोय का काढ़ा या अर्क पिलाएं तथा लेप भी करें। मकोय का रस भी अत्यधिक लाभकारी माना गया है। उपयोग हेतु मकोय का स्वरस निकालकर उसे एक मिट्टी के पात्र में भरकर धीमी आंच पर गरम करें। धीरे-धीरे उसका हरा रंग बदलने लगेगा तथा लालिमा लिए हुए बादामी रंग का हो जाएगा। इसी समय इसे उतारकर छान लेना चाहिए। यदि 150-200 मि.ली. की मात्रा में इसका सेवन किया जाए, तो यकृत के रोग समाप्त होने लगते हैं।
उपरोक्त उपायों में से सुविधा व आवश्यकतानुसार 3-4 उपायों को अपनाएं।

योग विकित्सा
कपालभाति क्रिया, वज्रासन, शलभासन, हलासन, पादहस्तासन यकृत के लिए लाभकारी है।

आहार चिकित्सा
समय से नियमित, संतुलित, सुपोषित, नियमानुसार भोजन करना लिवर के लिए प्रथम आवश्यक उपचार होता है, जो यकृत की कार्यक्षमता को समुचित चलने देता है। जिसमें 6 रस (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त व कषाय) का सेवन प्रत्येक 24 घंटे में संतुलित रूप में अति आवश्यक है।

  • विटामिन ‘सी’, विटामिन ‘ई, जिंक जैसे विटामिन व मिनरल यकृत हेतु लाभकारी हैं।
  • रात में दूध, दोपहर में छाछ व सुबह दही खाना यकृत पोषक व डीटॉक्सीकेशन हेतु बेहद आवश्यक है।
  • छोटे प्याज आधा किलो को चौकोर काटकर सिरके में डाल दें। ऊपर से जरा-सा नमक और काली मिर्च डाल दीजिए। प्रतिदिन सुबह-शाम 1-1 प्याज खिलाएं। पीलिया दूर होगा।
  • पके हुए केले के गूदे में 1 चम्मच शहद और पाव चम्मच मेहंदी के पत्ते का रस मिलाकर सेवन करें।
  • 1 बताशे पर कच्चे पपीते का रस 10 बूंद डालिए। 10-15 दिन यह खाने से पीलिया दूर होता है। कच्चे पपीते की बिना मिर्च-मसाले की सब्जी खाएं। 10-12 दिनों में पीलिया में फर्क नजर आएगा।
  • हिपेटाइटिस रुग्णों के लिए सेब, अनानास, अंगूर, चीकू अंजीर, खरबूजा, नारियल पानी, आंवला, गाजर इत्यादि फलों का सेवन हितकर है।
  • मूली एवं मूली के पत्तों का स्वरस एक कप की मात्रा में प्रातः व सायं लेते रहने से यकृत शोथ शीघ्र ठीक होता है। मूली एवं मूली के पत्तों का साग बराबर लेते रहना भी फायदेमंद है। इस उद्देश्य से चरपरी मूली विशेष फलदायी रहती है। सूखी मूली का सूप पीने से पुराने यकृत शोथ में लाभ मिलता है। मूली का क्षार एक ग्राम की मात्रा में दोनों समय भोजनोपरांत लेने से भी यकृत की सूजन ठीक होती है। 5 तोला मूली के पत्तों का अर्क एक तोला मिश्री में मिला लें और बासी मुंह पिएं। यह पीलिया के लिए रामबाण औषधि है। 15 दिन सेवन करें।
  • कच्चे पपीते को छीलकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके सिरके में डाल दें। 8-10 दिनों के बाद प्रतिदिन भोजनोपरांत 1-2 टुकडे का सेवन करने से कुछ ही दिनों में यकृत संबंधी विकृतियां दूर हो जाती हैं।
  • गाजर के रस में एक नींबू का रस मिलाकर पीने से भी यकृत की गड़बड़ी दूर होती है। गाजर और पुराना गुड़ 100-100 ग्राम की मात्रा में 750 मि.ली. जल में रात में आग पर पका लें। जब गाजर गल जाए, तो सुबह चांदी के 2 वर्क लगाकर 10 दिनों तक खाएं। इससे यकृत की गरमी तथा पीलिया में फायदा होता है।
  • यकृत के लिए टमाटर का रस बेहद फायदेमंद है। टमाटर का रस शरीर में एकत्रित विषैले तत्वों को बाहर निकालने में अति प्रभावी है। इसके सेवन से कब्ज नहीं रहता है, फलस्वरूप शरीर यकृत के रोगों से बचा रहता है।
  • अनार का जूस और ताजे आंवले का रस 1-1 चम्मच की मात्रा में एक साथ मिलाकर पीने से अधिक शराब पीने से उत्पन्न हुआ यकृत शोथ एवं काठिन्य (कड़ापन) ठीक हो जाता है और यकृत पुनः पूर्ववत कोमल एवं स्वस्थ हो जाता है।
  • यकृत की गड़बड़ी में जामुन त्वरित लाभ पहुंचाता है। इसका नियमित सेवन करने से यकृत की क्रिया में सुधार होता है। जामुन के मौसम में प्रतिदिन लगभग 250 gm उत्तम कोटि के पके हुए जामुन खाने से यकृत की गरमी दूर हो जाती है।
  • हल्दी, जीरा, दालचीनी, इलायची, धनिया, राई, हींग, तेजपत्ता, लौंग जैसे मसाले संतुलित मात्रा में यकृत के लिए लाभदायक होते हैं।
  • मूंग की दाल और षष्ठी चावल लाभकर होते हैं।
  • नारियल का पानी, सौंफ का अर्क, षडंगपानीय, मूंगदाल का सूप, जीरे का पानी, गन्ने का रस हिपेटाइटिस में लाभदेता है।
  • तैलीय व वसीय भोजन यकृत की सूजन में नुकसान करता है। यदि थोड़ा-बहुत खा रहे हों, तो तुरंत पानी के स्थान पर नमकीन मुने जीरे के साथ सेंधा व काला नमक से युक्त छाछ, मठ्ठा, तक्र (नमकीन लस्सी) का प्रयोग हितकर होता है।
  • पालक, गुडूची पत्र, पुनर्नवा पत्र, लौकी, परवल, बथुआ, कच्चा केला, पुराना चावल, मुनक्का, गेहूं, जौ, मूंग, अरहर, मसूर, चौलाई, गौघृत, गौदुग्ध, तक्र आदि लाभकर हैं।

बचाव के उपाय
हिपेटाइटिस से बचने के लिए मुख्यतः स्वच्छता के प्रति जागरूक रहना चाहिए। अन्न व जल की शुद्धता का ध्यान रखें। घर के आसपास का परिसर स्वच्छ होना चाहिए। वर्षा ऋतु में पानी मटमैला होता है, जिसे उबालकर ही पीना चाहिए। पाचनशक्ति बढ़ाने के लिए भूख से कम खाएं। आहार में अदरक, सौंठ व जीरे का प्रयोग करें। पेट साफ रहे, इस बात का ध्यान रखें। घर में भोजन को ढंककर रखें। खुला रखा व बासी अन्न बिल्कुल न खाएं। रक्तदान, सर्जरी, यौनसंपर्क इत्यादि मे सावधानी बरतें ।

अपथ्य

  • सभी तरह के अम्ल, विदाही अन्न जो जलन करें, भारी, पदार्थ सरसों का तेल, उड़द, पान, गर्म मसाला, राई, दूध का अधिक सेवन, धूम्रपान, क्रोध, शोक, चिंता करना, मात्रा से अधिक तैल व घी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • अल्कोहल, लाल मांस, बहुत अधिक गरम मसाले, मिर्च आदि यकृत की सूजन होने पर घातक होते हैं।
  • नींद पूरी न होना भी कहीं न कहीं यकृत के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
  • तम्बाकू एवं तेज धूप का अधिक सेवन यकृत के लिए नुकसानकारक है।
  • यकृत शोथ जैसे गंभीर विकार से सुरक्षित रहने के लिए मांस, मछली, शराब, गरिष्ठ पदार्थ, चाय, कॉफी, बासी भोजन, सड़े व बासी फल, दूषित खाद्य पदार्थ आदि अपथ्य हैं। अधिक मैथुन, अधिक मेहनत आदि भी त्याज्य हैं।
  • इस प्रकार आहार-विहार में सतर्कता बरतकर अपने लिवर की सुरक्षा करें। संयमित व नियमित जीवनशैली अपनाकर हिपेटाइटिस जैसे रोगों से स्वयं का बचाव करें। यदि हिपेटाइटिस से ग्रस्त हो जाएं, तो आयुर्वेद में वर्णित वनौषधियों का चिकित्सक के मार्गदर्शन में सेवन कर स्वास्थ्य लाम प्राप्त करें। सवेरे 4-5 किलोमीटर तक टहलने, सामर्थ्य के मुताबिक व्यायाम करने और खानपान के नियमों का तत्परतापूर्वक पालन करने से यह विकार निश्चित रूप से शांत होता है।
Dr Anju Mamtani

डॉ. अंजू ममतानी
‘जीकुमार आरोग्यधाम’

238, नारा रोड, गुरु हरिक्रिशनदेव मार्ग,
जरीपटका, नागपुर