
महानगरों में प्रदूषण तेजी से बढ़ने के कारण श्वास रोग अस्थमा का प्रकोप भी बढ़ा है। कुछ दशक पहले यह रोग अधिक आयु वालों को ही पीड़ित करता था, लेकिन अब तो किशोर और युवा भी इससे पीड़ित होने लगे हैं। अस्थमा रोग का प्रकोप शीत ऋतु और वर्षा ऋतु में अधिक देखा जाता है। वर्षा ऋतु में वातावरण में वायु अधिक आर्द्र हो जाती है, जिसके कारण दमा के रुग्ण को श्वास लेने में कठिनाई होती है। उचित निदान एवं उपचार से इस पर नियंत्रण संभव है।
मनुष्य शरीर में श्वास का महत्वपूर्ण स्थान है। ईश्वर ने मनुष्य शरीर में इस तरह व्यवस्था की है कि श्वसन की नियमित क्रिया जारी रहती है। एक बार हम भोजन करना भूल सकते हैं, लेकिन श्वसन क्रिया, हृदय का धड़कना, खून का दौरा यह सभी क्रियाएं स्वयं ही निर्बाध गति से चलती रहती हैं। नियमित रूप से होने वाली श्वसन क्रिया में व्यक्ति यदि कोई कठिनाई महसूस करता है, तो उसे श्वास रोग या अस्थमा कहा जाता है। दरअसल श्वसन क्रिया के माध्यम से ऑक्सीजन श्वास नलिकाओं से होकर फेफड़ों तक जाती है। दमा से ग्रस्त रुग्ण में फेफड़ों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिलती। इस वजह से सांस लेने में कष्ट होता है।
संपूर्ण विश्व में कष्टदायक रोगों में दमा का अंतर्भाव होता है। इसे महादुखदायी रोग कहा गया है, जो बड़ी मुश्किल से ठीक होता है। इसलिए ‘दमा रोग दम के साथ ही जाता है’, यह कहावत प्रचलित है। जब रुग्ण को अस्थमा का वेग आता है, तब वह इस कदर विचलित हो जाता है, मानो अभी श्वास की डोर टूटी। यह रोग जीवन में अंतिम समय तक परेशान करता रहता है। दमा स्वतंत्र रूप से होने वाली व्याधि है, परंतु अन्य रोगों के फलस्वरूप भी यह रोग होता है। जैसे हृदयरोगजन्य दमा बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक उम्र के किसी भी पड़ाव में हो सकता है।
मुख्य संबंध श्वसन संस्थान से
अस्थमा मुख्यतः श्वसन संस्थान से संबंधित रोग है। श्वास-नलिका में सिकुड़न, ऐंठन, क्षोभ, श्लेष्मकला में सूजन व उनमें कफ भर जाने से दमा का वेग आता है। श्वसन-नलिकाओं के सिकुड़ने के कारण रोगी को ऑक्सीजन बराबर नहीं मिलने से वह जल्दी-जल्दी सांस लेने की कोशिश करता है। सांस लेने में उसे अधिक जोर लगाना पड़ता है।

अस्थमा के दौरे के समय अर्थात् जब सांस फूलने लगती है, तो फेफड़ों में स्थित श्वास नलिकाओं में ऐंठन आ जाती है, जिससे वे सिकुड़कर तंग हो जाती हैं। इन्हें ब्रोंकाई (Bronchi) तथा छोटी श्वास नलिकाओं को ब्रोन्कियोल्स (Bronchioles) कहते हैं। इनकी दीवारों में पेशियां होती हैं, जिनके द्वारा ये खुलती तथा बंद होती हैं। प्रत्येक ब्रोन्कियोल्स का अंतिम सिरा गुब्बारे के समान एक छोटी थैली में खुलता है, जिसे एल्वियोलस (सअमवसमे) कहते हैं। इस प्रकार की लाखों थैलियां फेफड़ों में होती हैं।
सांस लेने पर जब श्वास नलिकाएं खुलती हैं, तो बाहरी वायु श्वास-नलिकाओं से होकर इन थैलियों में पहुंच जाती है। इन थैलियों की दीवारें बहुत पतली होती हैं, जिससे इनमें स्थित सांस के साथ खींची गई वायु की ऑक्सीजन इनकी दीवारों से गुजरकर रक्त में मिल जाती है। उसी समय रक्त के शरीर में भ्रमण करते समय निकले अपशिष्ट पदार्थ के रूप में संचित कार्बन डाइ ऑक्साइड इन थैलियों की दीवारों से गुजरकर थैलियों में आ जाती है, जहां से सांस छोड़ते समय बाहर निकलकर वायुमंडल में मिल जाती है।
पेशियों में आ जाती है ऐंठन
अस्थमा के दौरे के समय रोगी जब सांस बाहर फेंकता है, तो श्वास-नलिकाओं की पेशियों में ऐंठन आ जाने के कारण फैलने की बजाय वे तंग हो जाती हैं। इस प्रकार फेफड़ों में स्थित कार्बन डाइ ऑक्साइड मिली वायु मुश्किल से बाहर निकलती है। इसे निकालने में बहुत कठिनाई होती है और बाहर निकालने के प्रयास से ही अस्थमा की विशिष्ट ध्वनि सांय-सांय उत्पन्न होती है।
श्वास-नलिकाओं की दीवारों से रिसने वाले श्लेष्मा (बलगम) से सांस लेने में कठिनाई उत्पन्न हो जाती है। यह श्लेष्मा श्वास-नलिकाओं के मुंह में फंसकर और भी अवरोध उत्पन्न कर देता है।
एसिटाइल कोलीन (Acetyl Choline) वायुमार्गों में स्थित पेशियों पर क्रिया करके श्वास नलिकाओं को तंग बना देता है, इसके अतिरिक्त एक अन्य प्राकृतिक रासायनिक पदार्थ के द्वारा श्वास-नलिकाएं विशेषतः संकुचित होती हैं, जो हिस्टामीन (Histamin) कहलाता है। यह स्थिति शरीर में सूजन उत्पन्न करती है। साथ ही श्लेष्मा (बलगम) की उत्पत्ति भी श्वास नलिकाओं के मार्ग को तंग बना देती है।
खांसी वास्तव में एलर्जी द्वारा नहीं, वायुमार्गों में शोथ हो जाने से उत्पन्न होती है। यह शोथ संक्रमण, धूम्रपान, धूल अथवा दूषित वायु के संसर्ग से उत्पन्न होता है। नमी एवं ठंड के मौसम में खांसी और भी बढ़ जाती है। जब कोई व्यक्ति रोगाणु संक्रमण से पीड़ित होता है और विषाणु या वायरस फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं तो उग्र खांसी होती है। जब फेफड़ों में काफी समय से ब्रोंकाई क्षोभित होते रहते हैं, तब उनका क्षय होकर वे सिकुड़कर तंग हो जाते हैं, जिससे जीर्ण अथवा पुरानी खांसी होती है। इस रोग में रोगी का अत्यधिक खांसी तथा चिपचिपा बलगम न निकलने के कारण सांस लेने में कठिनाई होती है।
किसी भी मौसम में आक्रमण संभव

अस्थमा का रोग वर्ष के किसी भी मौसम में हो सकता है। अस्थमा के रोगी अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक पीड़ित होते हैं, इसका मुख्य कारण यह है कि वे कई पदार्थों के प्रति एलर्जिक होते हैं। बहुत से रोगियों को ठंडे मौसम में इसका कम असर होता है, परंतु गर्मियों में उनकी हालत खराब हो जाती है क्योंकि परागकण (Pollens) वसंत एवं गर्मी के मौसम में अधिक होते हैं।
पुराने अस्थमा के रोगियों की नाक में कभी-कभी एक गोल मुलायम संरचना उत्पन्न हो जाती है, जिसे ‘पालिप्स’ (Polyps) कहते हैं। यह नाक के आंतरिक भाग को ढंकने वाली झिल्ली से बनी होती है। इससे घ्राण (सूंघने) शक्ति कम होकर सांस लेने में थोड़ी परेशानी हो जाती है। पुराने नज़ले के रोगियों में भी लंबे समय यह एलर्जी की क्रिया के कारण अस्थमा का रोग हो जाता है।
आयुर्वेद की व्याख्या एवं कारण
आयुर्वेदानुसार इसे श्वास रोग कहा गया है। जिसके मुख्यतः 5 प्रकार बताए गए हैं। महा श्वास, ऊर्ध्व श्वास, छिन्न श्वास, तमक श्वास और क्षुद्र श्वास। इसके निम्न कारण बताए गए हैं-
आनुवंशिक – यदि आपके परिवार के किसी सदस्य को दमा है, तो संभव है कि आपको भी यह हो। बहुत सारे मामलों में यह रोग एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आ जाता है। यही कारण है कि एक पीढ़ी के सदस्यों में से किसी में पाई जाने वाली किसी वस्तु, सामग्री-विशेष जैसे कि धूल कण आदि से होने वाली सांस की एलर्जी संबंधी शिकायत उनके बच्चों में भी आ जाती हैं।
आहारजन्य दमा – तेल या मसाले वाले पदार्थों का अति सेवन, भारी पदार्थ का अपचन, जो कब्ज पैदा करे, रूखा अन्न, अभिष्यंदी, जैसे रात में दही या दूध, केला, सलाद, आइसक्रीम के साथ एवं शीतल आहार जैसे फ्रिज का ठंडा पानी, शीत पेय एवं तम्बाकू आदि के सेवन से श्वास रोग हो सकता है।
विहारजन्य दमा – हमेशा शीत स्थान में रहना जैसे -वातानुकूलित ऑफिस में काम करना इसका प्रधान कारण है या बर्फीले स्थान पर सफर करना आदि। धूल एवं धुआं भी इस रोग के प्रधान कारण हैं। औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले भी दमा से ग्रस्त हो सकते हैं। आयुर्वेद शास्त्र में वर्णन है कि तीव्र वायु में रहना, सीमा से अधिक व्यायाम करना, वेगावरोध जैसे मल-मूत्र के वेगों को रोकना, पोषणयुक्त आहार न लेना आदि कारण भी दमा को आमंत्रित करते हैं।

बालकफ – बच्चों में होने वाला कफ का प्रकोप बालकफ (निमोनिया) कहलाता है, जिसकी उचित चिकित्सा न होने पर दमे का रूप धारण कर सकता है। बालकफ में बच्चे को निरंतर सर्दी-खांसी, खांसते-खांसते उलटी करना, उलटी में कफ निकलना, सांस लेने में कष्ट, नित्य हांफना, सांस लेते समय घुर्र-घुर्र आवाज, रात में रोना, कभी-कभी बुखार, वजन कम हो जाना इत्यादि लक्षण पाए जाते हैं। एंटीबायोटिक्स लेने से बच्चा कुछ दिन चैन की सांस लेता है, पर मौसम परिवर्तन से उसे बार-बार सर्दी-खांसी होती है। बच्चों में बालकफ के लक्षण मुख्यतः 6 माह से 6-7 वर्ष तक पाए जाते हैं। हमने 26 वर्ष के चिकित्सानुभव में पाया है कि बालकफ के रुग्णों में आयुर्वेद चिकित्सा से पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।
अन्य कारण

दमा फेफड़े, हृदय, गुर्दे, आंत व स्नायु-मंडल की दुर्बलता व नाक के रोग के फलस्वरूप भी हो सकता है। खून की कमी (रक्ताल्पता) व कमजोरी से भी दमा हो सकता है। साइनोसाइटिस, इओसिनोफिलिया, टी.बी., सतत खांसी-सर्दी का पूरी तरह से इलाज नहीं करने पर भी दमा होता है।
संक्षेप में दमा के मुख्यतः तीन कारण कहे गए हैं-
1) एलर्जी, 2) संक्रमण तथा 3) मानसिक विक्षोभ ।
जिन कारणों से दमा का वेग आता है, उसे श्वासकारक भी कहते हैं। यह रोग मुख्यतः कारणों के संपर्क में आने के बाद 2 तरह से होता है-
1) तुरंत होने वाला।
2) कुछ घंटे पश्चात होने वाला।
उदाहरण के लिए डस्टिंग करते वक्त किसी-किसी व्यक्ति को धूल के संपर्क में आने से तुरंत दमा का वेग आता है, जबकि अन्य व्यक्ति में 8-10 घंटे पश्चात यह वेग आता है। यही कारण है कि दमा के कारकों के संपर्क में आने से कई बार व्यक्ति को रात के समय दमा का दौरा आता है। ये कारण शरीर में एलर्जी के द्वारा दमा बढ़ाते हैं। इन कारणों में धूल-धुआं, फूलों के परागकण, घास, पालतू जानवर जैसे कुत्ते इत्यादि के रोम के संपर्क में आना, कोई तीव्र गंध इत्यादि हैं। कभी-कभी किसी विशिष्ट आहार से भी दमा का प्रादुर्भाव होता है। बिना एलर्जी के होने वाले दमा के कारणों में पुरानी सर्दी-खांसी, मानसिक तनाव, अनिद्रा, अति श्रम, अति व्यायाम का अंतर्भाव होता है।
एलर्जी – किसी विशेष वस्तु, औषधि या आहार के प्रति जो संवेदनशीलता व्यक्ति में उत्पन्न होती है, वह एलर्जी कहलाती है। अधिकांश व्यक्तियों में इस प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होती। एलर्जी प्रायः वंशानुगत भी होती है। एलर्जी उत्पन्न करने वाले पदार्थों को एलर्जन (Allergen) कहते हैं। इन एलर्जन में घर की धूल, घर की वस्तुओं के कण, परागकण (Pollens), मिट्टी आटे की धूल, बाल इत्यादि का समावेश होता है। कुछ खाद्य पदार्थों जैसे-दूध, मूंगफली, मछली, दालों, अंडा, सोयाबीन इत्यादि से भी कुछ व्यक्तियों को एलर्जी होती है। इसके अलावा कुछ वस्त्रों, विशेष फूलों, इत्र के वातावरण आदि से भी यह हो सकती है।
लक्षण

अस्थमा का दौरा किसी कीड़े के काटने के बाद, वायु प्रदूषण, संक्रमण के कारण, थका देने वाली कसरत के बाद या भावनात्मक तनाव के दौरान भी पड़ सकता है।
दमा लगातार लक्षण उत्पन्न करने वाला विकार नहीं है। यह बीच-बीच में उभरकर फिर शांत हो जाता है, उस दौरान मरीज पूर्णतः स्वस्थ नजर आता है।
इसमें श्वसन नली के शोथजन्य होने की वजह से सिकुड़ने से सांस लेने में कष्ट, सांस लेते समय सीटी बजने जैसी घुर्र-घुर्र आवाज, दम घुटना, पेट फूलना, सदैव अल्प ज्वर की प्रतीति होना आदि लक्षण होते हैं। खांसी का दौरा जारी रहता है, आंखें फैली व डरावनी लगती हैं, रोगी को नींद नहीं आती तथा बेचैनी महसूस होती है। जब सीने की असंख्य ग्रंथियां कफ से भरी होती हैं, तो दमे का दौरा होता है। यह आधा घंटा व इससे अधिक भी रह सकता है। जब कफ ढीला पड़कर निकलने लगता है तो दमे का दौरा कम होने लगता है। दमे के वेग के समय छाती में भारीपन, दर्द व कमजोरी रहती है। अतः यह कष्टसाध्य व्याधि है। दमा के रोगी का सामान्य स्वास्थ्य भी प्रायः अच्छा नहीं रहता है। पीड़ित व्यक्ति में तनाव, थकावट, अत्यधिक पसीना आना, खून की कमी, सीने में भारीपन, वजन कम होते जाना, रक्तचाप कम रहना, भूख कम लगना, कब्ज रहना आदि लक्षण मिलते हैं।
एकाएक प्रारंभ हो सकता है वेग
यह व्याधि वेग (Attack) के रूप में होती है। कभी-कभी बिना किसी पूर्वरूप के अचानक ही दमा का वेग प्रारंभ हो जाता है। अधिकांशतः रात के अंतिम प्रहर में इसका वेग आता है। अचानक रोगी को दम घुटता-सा प्रतीत होता है। लेटने से श्वास कष्ट अधिक होता है, इसलिए रुग्ण बैठना अधिक पसंद करता है। कभी-कभी बैठने में भी असुविधा महसूस करता है। तब दोनों कोहनी के बल टेककर जोर से श्वास लेने का प्रयत्न करता है, फिर भी श्वास कष्ट अधिक महसूस होता है। दमे का दौरा मुख्यतः अधिक नमी, वर्षा ऋतु, अत्यंत शीत वातावरण में रुग्ण को कष्ट देता है, परंतु किसी भी मौसम में यह आ सकता है। दमा में श्वास की गति 50-60 बार प्रति मिनट (प्राकृत श्वसन गति 18-20 बार प्रति मिनट) हो जाती है। फेफड़ों में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से रुग्ण जल्दी-जल्दी श्वास लेता है। ऑक्सीजन कम होने से रुग्ण का चेहरा व शरीर नीलाभ दिखाई देता है। दमा का वेग आधे या एक घंटे तक रहकर स्वयं ही समाप्त हो जाता है। खांसी आने पर रुग्ण की छाती में जमा कफ धीरे-धीरे बाहर निकल जाने से दौरा समाप्त हो जाता है।
इसके अलावा हृदय रोग के कारण भी दमा का रोग होता है। दमे का यह वेग 40 से 50 वर्ष की उम्र के पश्चात प्रारंभ होता है। पहले रुग्ण को रात में श्वास कष्ट व खांसी की तकलीफ होती है। श्वास लेने में कष्ट कम, लेकिन तीव्रता विशेष रूप से होती है तथा कफ निकलता है। फेफड़ों के निम्न भाग में कफ भर जाने से जांच करने पर एक विशेष ध्वनि मिलती है, जिसे क्रिपिटेशन (Crepitation) की ध्वनि कहते हैं। श्वास कष्ट के साथ रुग्ण का रक्तचाप बढ़ा होता है। छाती फूली हुई नहीं होती है। इसे हृदयरोगजन्य श्वास रोग (Cardiac Asthama) कहते हैं।
रोग निदान
दमे के रोग का निदान कोई कठिन काम नहीं है। इसे लक्षणों के द्वारा बहुत ही आसानी से पहचाना जा सकता है। रोग की पुष्टि के लिए निम्न बातों की सहायता ली जा सकती है-
- यह रोग मुख्य रूप से विभिन्न वस्तुओं से होने वाली एलर्जी के फलस्वरूप होता है। अतः एलर्जन का ज्ञान होना इस रोग के निदान में सहायक है।
- परिवार में दमे का पूर्व इतिहास मिलने पर भी इस रोग को पहचानने में मदद मिलती है।
- प्रयोगशाला परीक्षण द्वारा बलगम तथा खून की विभिन्न जांचों से भी इस रोग की पुष्टि की जा सकती है। रोग की गंभीरता का अनुभव लगाने के लिए चेस्ट एक्स-रे एवं पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट की सहायता ली जाती है।
- चिकित्सक स्टेथोस्कोप के द्वारा फेफड़ों में विशेष ध्वनि घरघराहट (Ronchi) के जरिए दमा निदान करते हैं। यह ध्वनि रोगी द्वारा सांस छोड़ते समय स्पष्ट रूप से सुनाई देती है। साथ ही रोगी की त्वचा की सहनशीलता की जांच की जाती है कि उसे किस तरह की एलर्जी है।
5) फेफड़ों की जांच ‘स्पाइरोमेटरी’ भी दमा का पता लगाने का एक अन्य माध्यम है। स्पाइरोमीटर इस बात का पता लगाता है कि आप एक लंबी सांस लेकर कितनी हवा अंदर खींच सकते हैं अथवा बाहर छोड़ सकते हैं। यह हवा लेने से पहले तथा बाद में आपके फेफड़ों के वायु प्रवाह की जांच कर सकता है। कुछ अन्य नवीन उपकरण जैसे कि FeNo सेंसर यह बता सकता है कि रोगी के फेफड़ों में कितनी सूजन है।
एलोपैथिक उपचार

दमा कोई घातक रोग नहीं है। एलोपैथी में इसका इलाज तात्कालिक व अस्थायी है। ब्रान्कोडायलेटर व स्टेरॉइडस देने से रोगी कुछ समय तो चैन की सांस लेता है, परंतु कारणों के संपर्क में आने पर पुनः दमे से ग्रसित होता है। आजकल दमे के लिए इन्हेलर (Inhaler) का प्रयोग आमतौर पर किया जाता है। इन्हेलर के माध्यम से सांस की नली में दवाई पहुंचाकर रुग्ण को तात्कालिक आराम दिया जाता है। इसका प्रयोग रोजाना सुबह-शाम करना होता है। एक अन्य प्रकार का इन्हेलर आता है, जिसका जरूरत प्रयोग पड़ने पर ही किया जाता है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा
आयुर्वेदानुसार दमा रोग की चिकित्सा केवल औषधियों के सेवन से ही संभव नहीं है। इसके साथ-साथ रोगी को अपने रहन-सहन तथा आहार-विहार में भी सावधानी रखना जरूरी है। सबसे पहले तो यह निश्चित करें कि अस्थमा का कारण क्या है? यदि एलर्जिक अस्थमा है तो किस वस्तु से एलर्जी है, यह पता कर उससे बचने का प्रयास करें।
आयुर्वेदिक उपचार में उचित आहार-विहार, आयुर्वेदिक औषधियों व पंचकर्म द्वारा इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है और रोगी बड़े आराम से सामान्य जीवन जी सकता है। इसके उपचार के लिए ऐसी औषधियों की आवश्यकता पड़ती है, जो श्वसन नलिकाओं की सूजन को कम करें, उन्हें फैलाएं व संक्रमण न होने दें। इसका उपचार मुख्यतः 2 प्रकार से किया जाता है।
1) वेगकालीन और
2) वेग के पश्चात ।
वेग के दौरान ऐसी दवा देनी पड़ती है, जिससे बलगम पतला होकर निकल जाये।
प्रभावी औषधियां

1) बृहतश्वास कास चिंतामणि रस 1 वटी सुबह-शाम अदरक के रस के साथ खाली पेट लें।
2) कफ अधिक होने पर चौसठ प्रहर पिप्पली 10 ग्राम, मृगशृंगभस्म 5 ग्राम, शुद्ध टंकण भस्म 10 ग्राम, श्वासकुठार रस 10 ग्राम, सितोपलादि चूर्ण 10 ग्राम की 60 पुड़ियां बनाकर दिन में 3 बार शहद के साथ लें।
3) कनकासव व पिप्पल्यासव 2-2 चम्मच सुबह-शाम भोजन के बाद लें।
4) ब्रॉन्काइटिस या निमोनिया होने पर लक्ष्मी विलास (स्वर्ण-मोतीयुक्त) रस 1 ग्राम, रस सिंदूर 1 ग्राम, मृगशृंगभस्म 5 ग्राम, अभ्रक भस्म (सहस्रपुटी) 1 gm की 30 पुड़ियां बनाकर सुबह-शाम लें।
5) गले में कष्ट होने पर खदिरादि वटी 4-5 चूसने के लिए दें।
6) सर्दी होने पर उपरोक्त औषधियों के साथ त्रिभुवनकीर्ति रस 1 वटी या नारदीय लक्ष्मीविलास रस 1 वटी सुबह-शाम लें।
7) सोमलता चूर्ण 10 ग्राम, वासाचूर्ण 10 ग्राम, पिप्पली 10 ग्राम, तालीसपत्र 10 ग्राम, सोंठ 5 ग्राम व मिश्री 10 ग्राम की 60 पुड़ियां बनाकर सुबह-शाम शहद के साथ लें।
8) रसायन चिकित्सा में स्वर्ण मालिनी वसंत 1 वटी व च्यवनप्राश अवलेह सुबह-शाम लें।
9) दमा के दौरे के समय सोमलता का चूर्ण 1/4 से 1/2 चम्मच, रस सिंदूर 60 से 250 मि.ग्रा. मिलाकर शहद के साथ दिन में 4 बार चटाएं।
10) दमा का कारण एलर्जी हो तो हरिद्राखंड 1/2 से 1 चम्मच की मात्रा दूध के साथ सुबह-शाम लगातार 1 माह तक प्रयोग करने से उत्तम लाभ होता है।
11) अपामार्ग क्षार, कंटकारी क्षार, फूला हुआ सुहागा प्रत्येक 5-5 ग्राम, श्वास कुठार रस, अडूसा के पत्ते, आक के जड़ की छाल 10-10 ग्राम, सोमलता चूर्ण, तालीसादि चूर्ण 20-20 ग्राम को एक साथ घोंटें। इसमें अडूसा, छोटी कटोरी, अपामार्ग, धतूरा तथा नागरपान के रस में प्रत्येक के साथ 2-2 दिन तक घोंटकर चने के बराबर गोलियां बनाएं। 1 से 2 गोली सोमासव या कनकासव 2-2 चम्मच के साथ देने से दमा में लाभ होता है।
शास्त्रोक्त योग (योगरत्नाकर)
1) श्वास आदि में कुलत्थादि क्वाथ कुलथी, सोंठ, छोटी कण्टकारी तथा पुष्करमूल का चूर्ण मिलाकर पान करें। यह श्वास तथा कास को दूर करता है।
2) सिंह्याद्रि क्वाथ छोटी कटेरी, हल्दी, अडूसा, गुडूची,
सोंठ, पीपर, वभनेटी, नागरमोथा, पीपर तथा काली मिर्च समभाग का क्वाथ श्वासरूपी जंगली आग को बुझाने के लिए मेघ के समान है।
3) वासादि योग : अडूसा, हल्दी, धनिया, गुडूची, वभनेटी,
पीपर, सोंठ तथा छोटी कटेरी समभाग इन सबके क्वाथ में काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर पान करने से सभी प्रकार के श्वासरोग शांत हो जाते हैं।
4) द्राक्षादि क्वाथ : मुनक्का, गुडूची तथा सोंठ समभाग का
क्वाथ थोड़ा-थोड़ा गरम पानी के साथ सेवन कराने से सभी प्रकार के श्वास रोगों को नष्ट करता है। यह श्वास, शूलकास, अग्निमान्द्य, जीर्णज्वर तथा तृष्णा को नष्ट करता है।
5) शट्यादि चूर्ण: कपूरकचरी, वभनेटी, वच, व्योष (सोंठ,
पीपर, मरिच), हर्रे, रुचक नमक, कायफल, तेजोबल, पुष्करमूल तथा काकड़ासिंघी समभाग चूर्ण शहद के साथ चाटें।
6) हर्रे के चूर्ण में वभनेटी, मुलेठी, कुटकी, पीपर तथा व्योष (सोंठ, पीपर, मरिच) इन सबका चूर्ण मिलाकर मधु तथा घृत के साथ चाटें। यह श्वास रोग को नष्ट करता है।
7) गुड़, अनारदाना, मुनक्का, पीपर तथा सोंठ चूर्ण, बिजौरा नींबू के रस तथा शहद के साथ चाटें। यह योग श्वास रोग को दूर करता है।
आहार चिकित्सा
भोज्य पदार्थ: 1) रोगी का आहार ताजा, कफ निवारक, सुपाच्य, पौष्टिक, उष्ण गुणात्मक एवं क्षारयुक्त होना चाहिए। इस प्रकार का आहार रोग निवारक होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भी होता है।

2) कफ पैदा करने वाले पदार्थों के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए फल, शहद, अंकुरित अन्न व साग-सब्जियों का अधिक प्रयोग करें।
3) आहार में पुराने चावल, गेहूं के चोकर वाला आटा, जौ, गरम-गरम सब्जी, दाल व सूप लेना जरूरी है। हरी पत्तीदार सब्जियां जैसे मेथी, बथुआ, चौलाई, पालक, हलका सुपाच्य भोजन सेवन करें।
4) भोजन में रसीले फल जैसे मोसंबी, नींबू, संतरा, अनार, पपीता इत्यादि को ताजे रूप में खाएं अथवा रस रूप में प्रयुक्त करें। अंगूर का रस बलगम बाहर निकालता है। इससे रोग प्रतिकार शक्ति बढ़ती है और रोग धीरे-धीरे कम होता जाता है। फलों का सेवन सुबह नाश्ते या दोपहर भोजन के समय ही करें। फलों के रस के साथ सब्जियों के रस को न मिलाएं।
5) 2 चम्मच शुद्ध घी को अच्छे तरीके से गर्म करें। गरम घी में काली साबुत मिर्च और मिश्री डालकर खाएं, परंतु इसके बाद पानी न पिएं। तत्पश्चात छाती के आगे, पीछे, गले के ऊपर और चारों ओर मालिश करें। इससे जमा हुआ बलगम पिघलकर आसानी से निकलेगा।
6) हरी पत्तेदार सब्जियों का भरपूर प्रयोग करें। चौलाई की सब्जी दमा के रोगी के लिए लाभकारी है।
7) टमाटर, अदरक, गाजर के रस में नींबू का रस मिलाकर लें।
8) दमा के रुग्ण के लिए शहद के साथ अदरक का रस लेना हितकारी है।
9) ताजी लहसुन का रस आधा चम्मच खाली पेट लेने से बलगम ढीला होकर निकलता है व कीटाणुओं का भी नाश होता है।
10) भोजन के साथ कुनकुना पानी पिया जाए तो श्वास की समस्या कम हो जाती है।
11) दमा के रोगी में नमकयुक्त कुनकुने पानी से दिन में 3-4 बार गरारे करना चाहिए। भोजन और गरारे करने में 2 घंटे का अंतर होना आवश्यक है। नमक पानी से वमन भी करें।
12) खजूर या छुहारे को दूध में उबालकर लेने से भी दमे के रोगी को लाभ होता है, शरीर की शक्ति बनी रहती है व पेट साफ होता है। दोनों के अभाव में मुनक्का (दाख) या किशमिश को दूध में उबालकर पी सकते हैं।
13) दालचीनी को दूध में उबालें और इसमें थोड़ा-सा शहद डालकर रात को सोते समय लेने से छाती और गले में रुका हुआ बलगम सरलता से निकलता है।
14) बेसन की रोटी दमे में बहुत लाभकारी है, यदि इसे गर्म घी के साथ खाया जाए। वैसे काले चने का आटा पिसवाकर प्रयोग करने से भी बहुत लाभ होता है।
15) केवल दूध एकमात्र कभी न लें। उसमें सदा कोई चीज डालकर लें। सोयाबीन से तैयार हल्दीयुक्त दूध ले सकते हैं।
16) भोजन कभी भी पेट भरकर न खाएं और रात का आहार सोने से कम से कम 2 घंटे पूर्व अवश्य लें। खाना एकदम हलका, खटाई, मिर्च-मसाला-तेल से रहित होना श्रेयस्कर है।
अपथ्य आहार-विहार : 1) दमे के मरीज के लिए कब्ज अत्यंत घातक सिद्ध होती है। इसलिए आहार पर विशेष ध्यान देकर अपनी पाचनशक्ति को बढ़ाएं। जिन वस्तुओं से शरीर में गैस पैदा हो, जैसे आलू, चावल, कचालू, दही आदि का सेवन न करें। कब्ज उत्पन्न करने वाले आहार जैसा सूखा, चोकररहित खाद्यान्न, मैदे की रोटी, बाजार में बना भोजन, मांस आदि का प्रयोग न करें। पेट में वायु और बद्धकोष्ठता (कब्ज) से दमा रोग को बढ़ावा मिलता है। शाम का भोजन 7 से 8 बजे तक खाएं और वह हलका और कम मात्रा में लेना चाहिए।
2) दमा का रोगी ऐसे खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल न करे, जो कफ पैदा करते हैं। जैसे-चावल, आलू, भैंस का दूध, दही, मिठाइयां, साबूदाना, दालें, ठंडे पेय, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक और ठंडी तासीर वाली वस्तुओं का प्रयोग न करें।
3) खाने में दही का प्रयोग न करें, विशेषकर भैंस के दूध से तैयार दही।
4) रात को सोने के कमरे की खिड़कियां बंद रखें।
5) घर में धूल, मिट्टी और कूड़ा-कर्कट इकट्ठा न होने दें। पूरी सफाई रखें।
6) अपने बिस्तर की चादर, गद्दे और तकियों को पूरी तरह साफ रखें। प्रतिदिन उन्हें झटककर झाड़ दें।
7) कुत्ते, बिल्लियों, घोड़े आदि पशुओं का स्पर्श न करें।
8) फफूंद वाली चीजों को न छुएं।
9) धूम्रपान न करें। तम्बाकू, सिगरेट, चिलम, हुक्का आदि पीना बहुत हानिकारक हैं।
10) कूलर, ए.सी. में रहना हानिकारक है।
11) रात्रि के समय ठंड में घूमना तथा रात्रि जागरण वर्जित है। वर्षा में भीगने से परहेज करें।
12) अशुद्ध हवा व प्रदूषण से दूर रहें। खास तौर पर औद्योगिक एवं वाहनों के धुआं, मनोविकार, तनाव, कीटनाशक दवाओं, रंग-रोगन, लकड़ी के बुरादे से बचें। नियमित रूप से योगाभ्यास एवं कसरत करें।
विटामिन ‘ई’ व कैल्शियम उपयोगी

विटामिन ई दमा ठीक करने में इस विटामिन की अत्यधिक आवश्यकता है। यह रक्त कणों का निर्माण करता है। वायु प्रदूषण के कारण शरीर में होने वाले हानिकारक तत्वों के प्रभाव को कम करने में सहायक है। इसकी दैनिक खुराक 15-20 मिलीग्राम है।
यह अंकुरित गेहूं, पिस्ता, सोयाबीन, सफोला तेल, नारियल, घी, ताजा मक्खन, टमाटर, अंगूर, सूखे मेवों आदि में मिलता है।
कैल्शियम – दमा में कैल्शियम-प्रधान भोजन लाभ करता है। इसकी दैनिक मात्रा 0.8 ग्राम है, लेकिन आवश्यकता-नुसार अधिक मात्रा में भी ले सकते हैं। शरीर को जितने कैल्शियम की आवश्यकता होती है, वह प्रतिदिन 50 ग्राम तिल खाने से मिल जाता है। यह दूध, पालक, चौलाई, सोयाबीन, सूखे मेवे, आंवला, गाजर, पनीर आदि में पाया जाता है।
स्वर चिकित्सा
जब कभी दमा का दौरा उठे या श्वास फूलने लगे, तब तत्काल स्वर परीक्षा करें अर्थात् हथेली पर जोर से सांस फेंककर यह जानने का प्रयास करें कि नाक के कौन-कौनसे नथुने से सांस चल रही है।
सामान्यतः दाहिने नथुने से ली जाने वाली श्वास क्रिया को सूर्य स्वर व बाएं नथुने से ली जाने वाली श्वास क्रिया को चंद्र स्वर कहा जाता है।
इस प्रकार दम फूलते ही तुरन्त स्वर बदलने की कोई विधि अपनाकर स्वर बदल देने से आश्चर्यजनक फल मिलता है। स्वर बदल जाने से 10 से 15 मिनट में ही दम का फूलना घट जाएगा।
स्थायी रूप से श्वास रोग को दूर करने के लिए रोगी को प्रयत्नपूर्वक दिन-रात अधिक से अधिक दाहिना सूर्य स्वर चलाने का अभ्यास करना चाहिए। जैसे प्रातः उठते समय भोजन करने के लिए बैठते समय, भोजन करने के बाद और रात्रि सोते समय। सूर्य स्वर कफ शामक होने के साथ ही जठराग्निवर्द्धक भी है, जिससे दमा शान्त होता है।
भोजन ग्रहण करते समय और भोजन करने के पश्चात दाहिना स्वर चलाएं तो न केवल दमा रोग से उन्मूलन में सहायता मिलती है, बल्कि अजीर्ण, भूख न लगने और पाचनशक्ति के कमजोर होने की शिकायतें भी दूर हो जाती हैं। यदि रोगी सदैव दाहिने नथुने से सांस चलते समय ही भोजन करें और भोजन के बाद 15 से 20 मिनट बायीं करवट लेकर दाहिना स्वर चलाते रहें, तो भोजन आसानी से पच जाता है और उपरोक्त शिकायतें सुगमता से दूर हो जाती हैं।
अगर बदहजमी हो गई हो तो इस उपाय से वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है क्योंकि दाहिना स्वर पित्तवर्द्धक होने से इसे चलाने से पित्त या पाचक अग्नि को बल मिटता है।
दाहिना स्वर चलाने से शरीर में गर्मी बढ़ती है और बायां स्वर चलाने पर शीतलता। अतः जुकाम, खांसी, कफ और ठंड से उत्पन्न रोगों में यदि दाहिना स्वर अधिक चलेगा, तो रोगी जल्दी स्वस्थ हो जायेगा। इसके अतिरिक्त दाहिना स्वर चलाने से निम्न रक्तचाप में शीघ्र लाभ मिलता है। स्वर बदलने की विधि भी अत्यंत सरल है। कुछ देर बायीं करवट लेटने पर दाहिना स्वर और दाहिनी करवट लेटने पर बायां स्वर चलने लगता है।
योगोपचार
योगासन में महामुद्रा, मत्स्यासन, सर्वांगासन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन व नाड़ीशोधन प्राणायाम नियमित रूप से करना चाहिए। कफ अधिक रहने पर सूर्य स्वर से भस्त्रिका प्राणायाम, जलधौति, वस्त्रधौति, दीर्घश्वसन, पश्चिमोत्तानासन, शलभासन, ओंकार प्राणायाम इत्यादि करें। योगोपचार की विस्तृत जानकारी हेतु लेखक द्वारा लिखित ‘योगासन-स्वस्थ जीवन का शिल्पकार’ पुस्तक अवश्य पढ़ें।
पंचकर्म चिकित्सा

पंचकर्म के अंतर्गत स्थानिक सेंक, वमन, विरेचन, बस्ति, नस्य कर्म दमा के रुग्णों के लिए अनुभूत लाभदायक हैं। हमारे जीकुमार आरोग्यधाम में उपलब्ध विशेष चिकित्सा पैकेज से दमाग्रस्त असंख्य रुग्णों को इस व्याधि से छुटकारा मिला है। शुरुआत में एलोपैथिक औषधि के साथ यह चिकित्सा पैकेज देते हैं। कुछ समय पश्चात एलोपैथिक औषधि की मात्रा धीरे-धीरे कम कर दी जाती है। इस प्रकार दमे के रोगी को चाहिए कि आरंभ से ही इस बीमारी के प्रति गंभीरता बरते। लापरवाही हमेशा हानिकारक ही होती है। चिकित्सक के निर्देशानुसार ही दमे के रोगी को उक्त चिकित्सा लेने से आशातीत स्थायी लाभ मिलेगा। जल्दी स्वास्थ्य लाभ पाने और निरोगी रहने में उचित जीवनशैली की महती भूमिका है। अतः इसे भी अपनाएं और दमा को अपने दृढ़ संकल्प से हराएं।

डॉ. जी. एम. ममतानी
एम.डी. (आयुर्वेद पंचकर्म विशेषज्ञ)
‘जीकुमार आरोग्यधाम’,
238, गुरु हरिक्रिशनदेव मार्ग,
जरीपटका, नागपुर-14


